Yogi Adityanath Gorakhpur artists मुख्यमंत्री के शहर में बेघर कला: गोरखपुर के कलाकारों की पुकार अब सन्नाटे में गुम नहीं होगी
Yogi Adityanath Gorakhpur artists गोरखपुर, उत्तर प्रदेश यह शहर केवल भूगोल पर नहीं, बल्कि भावनाओं, रचनात्मकता और सांस्कृतिक धड़कनों पर बसा है।
यहां के कलाकार अपने रंग, संगीत और नृत्य से समाज को सजाते-संवारते हैं। लेकिन विडंबना देखिए, Performance योगी आदित्यनाथ के गृह जनपद में ही कला बेघर है, मंच बेआवाज़ है, और सपने बिना छत के हैं।
बैठक में दर्द का सैलाब, आंखों में आंसू और शब्दों में लावा
रविवार को समन्वय क्रिएटिव मंच के तत्वावधान में महात्मा गांधी इंटर कॉलेज के सभागार में जनपद के रंगकर्मी और सांस्कृतिक कार्यकर्ता जुटे।
यह सिर्फ एक बैठक नहीं, बल्कि वर्षों से दबे घावों का खुला बयान था।
अजय यादव, शैलेश त्रिपाठी ‘मोबाइल बाबा’, श्रीनारायण पांडेय, अमित पटेल, सुनील जायसवाल और राधेश्याम की आवाज़ में एक ही दर्द था,
“हमारे जिले में कलाकारों के लिए एक भी मुफ्त प्रेक्षागृह नहीं, न ही कोई स्थायी रिहर्सल स्थल। क्या हमारी कला की कीमत इतनी सस्ती है?”
मुख्यमंत्री तक नहीं पहुंची पुकार पर क्यों?
बैठक में यह सवाल बार-बार गूंजा जब गोरखपुर मुख्यमंत्री का शहर है, तो हमारी आवाज़ उनके कानों तक क्यों नहीं पहुंची?
कई बार ज्ञापन, कई बार बैठक, कई बार अपील… लेकिन जवाब में सिर्फ सरकारी चुप्पी और सन्नाटा।
मांगें जो सिर्फ कागज पर हैं, जमीन पर नहीं
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कलाकारों की मांगें ना तो अव्यावहारिक हैं, और ना ही भारी भरकम —
200–300 दर्शकों का एक छोटा लेकिन सुसज्जित प्रेक्षागृह
निशुल्क या नाममात्र शुल्क पर ऑडिटोरियम की उपलब्धता
स्थायी रिहर्सल हॉल जहां कलाकार अपनी कला को निखार सकें
अशोक महर्षि, अजीत प्रताप सिंह और विजय सिंह ने दूसरे राज्यों का उदाहरण देते हुए कहा:
“जहां संस्कृति को सम्मान है, वहां छोटे हॉल भी सरकार के संरक्षण में हैं। गोरखपुर में क्यों नहीं?”
Yogi Adityanath Gorakhpur artists नेताओं तक पहुंचने का संकल्प
बैठक की अध्यक्षता वरिष्ठ रंगकर्मी मानवेंद्र त्रिपाठी ने की।
उन्होंने स्पष्ट कहा
“अब भावनाओं के भ्रम रहने का समय खत्म, अब कार्रवाई का समय है। पहले हम जनप्रतिनिधि विधायक और सांसद से मिलेंगे, फिर मुख्यमंत्री से सीधे मुलाकात करेंगे। अगर तब भी दरवाजे बंद रहे, तो कला अपने संघर्ष का मंच खुद तैयार करेगी।”
मुख्यमंत्री के गृह जनपद की सच्चाई: मंच के बिना कलाकार
यूपी के मुख्यमंत्री का अपना शहर, लेकिन कलाकारों के पास ना मंच है, ना छत।
यह तस्वीर सिर्फ प्रशासनिक उदासीनता नहीं दिखाती, बल्कि यह भी साबित करती है, कि कला और कलाकार की चिंता भाषणों से ज्यादा जमीन पर चाहिए।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अक्सर मंच से कहते हैं कि संस्कृति हमारी पहचान है, लेकिन गोरखपुर में कलाकार आज भी पहचान के लिए तरस रहे हैं।
Yogi Adityanath Gorakhpur artists कलाकारों की सामाजिक ताकत और टूटते हौसले
ये कलाकार सिर्फ नाटक या गीत नहीं करते —
वे समाज की सच्चाई दिखाते हैं,
युवा पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ते हैं,
और शहर को एक पहचान देते हैं।
फिर भी उनके पास काम करने का स्थान नहीं। यह अपमान नहीं तो और क्या है?
कलाकारों के हौसले टूट रहे हैं, और इसके साथ ही शहर की सांस्कृतिक आत्मा भी कमजोर हो रही है।
Yogi Adityanath Gorakhpur artists बैठक में तय हुई अगली लड़ाई
सैकड़ों कलाकारों की मौजूदगी में यह फैसला हुआ कि:
1. एकजुट होकर मांग पत्र तैयार होगा
2. जनप्रतिनिधियों से सीधी मुलाकात होगी
3. जरूरत पड़ने पर सांस्कृतिक आंदोलन शुरू होगा — नाटक और कला के जरिए प्रशासन को आईना दिखाया जाएगा।
गोरखपुर और सरकार के लिए सवाल
क्या मुख्यमंत्री के शहर में कला का एक भी सुरक्षित आश्रय न होना उचित है?
क्या संस्कृति सिर्फ चुनावी मंच पर बोलने का विषय है?
क्या हम आने वाली पीढ़ी को यह सिखाना चाहते हैं, कि कलाकारों के लिए कोई जगह नहीं है?
जब कला खत्म होती है, तो सिर्फ मंच नहीं, समाज का भविष्य भी अंधेरे में चला जाता है।
अंतिम आह्वान: मंच दो, सम्मान दो
गोरखपुर के कलाकार किसी विशेषाधिकार की भीख नहीं मांग रहे।
वे सिर्फ मंच चाहते हैं, ताकि कला जिंदा रहे, शहर जिंदा रहे, और पहचान जिंदा रहे।
यह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए भी एक परीक्षा की घड़ी है।
अगर अपने ही शहर में कलाकारों को छत और मंच नहीं मिला, तो यह इतिहास में दर्ज होगा कि कला मुख्यमंत्री के घर के दरवाजे तक पहुंचकर भी, भीतर प्रवेश न कर सकी।”