छह साल तक आदेश की अनदेखी भारी पड़ी, Balrampur DM affidavit case में हाईकोर्ट ने दिखाई सख्ती, हर्जाना वापस लेने से साफ इनकार
Balrampur DM affidavit case में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सख्त रुख अपनाया है। छह साल तक जवाबी हलफनामा दाखिल न करने पर बलरामपुर डीएम पर लगाए गए 11 हजार रुपये के हर्जाने को वापस लेने से कोर्ट ने इनकार कर दिया।
Balrampur DM affidavit case कभी कभी अदालत का रुख यह साफ कर देता है, कि अब लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं बची है। Balrampur DM affidavit case में कुछ ऐसा ही देखने को मिला, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने बलरामपुर के जिलाधिकारी को दी गई राहत की मांग को ठुकरा दिया। छह साल तक बार बार आदेश दिए जाने के बावजूद जवाबी हलफनामा दाखिल न करने पर लगाए गए 11 हजार रुपये के हर्जाने को वापस लेने से न्यायालय ने स्पष्ट इनकार कर दिया है। कोर्ट ने जिलाधिकारी को तीन दिनों के भीतर यह राशि जमा करने का आदेश दिया है, और मामले की अगली सुनवाई जनवरी के दूसरे सप्ताह में तय की है।
यह पूरा मामला वर्ष 2019 में दाखिल एक जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें नबी अली व अन्य याचिकाकर्ताओं ने बलरामपुर जनपद में स्थित एक अंत्योष्टि स्थल पर शेड लगाए जाने की मांग उठाई थी। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने 8 नवंबर 2019 को पहली बार जिलाधिकारी बलरामपुर को लघु प्रतिउत्तर शपथ पत्र दाखिल करने का निर्देश दिया था। इसके बाद 22 नवंबर 2019, 6 दिसंबर 2019 और 5 मार्च 2020 को भी अदालत ने समय दिया, लेकिन इसके बावजूद कोई जवाब दाखिल नहीं किया गया। छह वर्षों तक आदेशों की अनदेखी को अदालत ने गंभीर लापरवाही माना और 20 नवंबर को Balrampur DM affidavit case में जिलाधिकारी पर 11 हजार रुपये का हर्जाना लगा दिया।
हर्जाने के इस आदेश को वापस लेने के लिए अदालत में प्रार्थना पत्र दाखिल किया गया, लेकिन यहां भी प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए। न्यायालय ने आश्चर्य जताया कि यह प्रार्थना पत्र स्वयं जिलाधिकारी द्वारा नहीं, बल्कि एक सहायक अभियंता द्वारा दाखिल किया गया, जो इस मामले में पक्षकार भी नहीं है। प्रार्थना पत्र में यह तर्क दिया गया कि लघु शपथ पत्र तैयार कर मुख्य स्थायी अधिवक्ता के कार्यालय में दे दिया गया था। इस पर अदालत ने साफ कहा कि यह न तो न्यायालय का विषय है,और न ही हाईकोर्ट प्रशासन का, बल्कि यह जिलाधिकारी और मुख्य स्थायी अधिवक्ता के बीच का आंतरिक मामला है। इसी आधार पर कोर्ट ने Balrampur DM affidavit case में आदेश वापस लेने से इनकार कर दिया।
कानूनी जानकारों के अनुसार, यह फैसला केवल बलरामपुर तक सीमित नहीं है। Balrampur DM affidavit case प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक स्पष्ट संदेश देता है,कि न्यायालय के आदेशों की अवहेलना को अब हल्के में नहीं लिया जाएगा। जनहित याचिकाओं से जुड़े मामलों में देरी सीधे तौर पर आम जनता के अधिकारों को प्रभावित करती है। अदालत का यह सख्त रुख यह भी दर्शाता है, कि वरिष्ठ पद पर बैठे अधिकारियों से जवाबदेही की अपेक्षा और अधिक होती है। आने वाले समय में ऐसे मामलों में प्रशासन को समयबद्ध और जिम्मेदार रवैया अपनाना ही होगा, अन्यथा कानूनी कार्रवाई और कड़ी हो सकती है।
Disclaimer यह लेख न्यायालय में उपलब्ध तथ्यों और आदेशों पर आधारित है। मामला न्यायिक विचाराधीन है। किसी भी अधिकारी या पक्ष के विरुद्ध अंतिम निष्कर्ष माननीय न्यायालय के निर्णय के अधीन होगा।