Lucknow Land Mafia Case: 270 बीघे अर्बन सीलिंग की सरकारी जमीन बिक गई, 2 अरब का खेल और हाथ पर हाथ धरे अधिकारी
Lucknow Land Mafia Case में बड़ा खुलासा, राजधानी लखनऊ में 270 बीघे सरकारी अर्बन सीलिंग जमीन अवैध रूप से बेची गई, कीमत 2 अरब से ज्यादा, प्रशासन और LDA की भूमिका सवालों के घेरे में
लखनऊ,उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में सरकारी जमीन की लूट का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। Lucknow Land Mafia Case में खुलासा हुआ है, कि भूमाफियाओं ने अर्बन सीलिंग के तहत आने वाली करीब 270 बीघे सरकारी जमीन को अवैध रूप से बेच डाला, जिसकी अनुमानित कीमत 2 अरब रुपये से अधिक है। हैरानी की बात यह है,कि यह सब कुछ वर्षों तक चलता रहा और जिला प्रशासन व लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) मूकदर्शक बने रहे।
कागजों में यह जमीन आज भी सरकारी और अर्बन सीलिंग की श्रेणी में दर्ज है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। वहां प्लॉट कट चुके हैं, मकान बन चुके हैं,और अवैध कॉलोनियां आबाद हो चुकी हैं। इसके बावजूद न तो समय रहते कार्रवाई हुई और न ही सरकारी जमीन को सुरक्षित किया जा सका।
अर्बन सीलिंग की 270 बीघे जमीन कैसे गायब हुई
Lucknow Land Mafia Case के केंद्र में लखनऊ के औरंगाबाद जागीर और औरंगाबाद खालसा इलाके की जमीन है।
आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार
औरंगाबाद जागीर: 2,43,185.55 वर्ग मीटर
औरंगाबाद खालसा: 4,33,760.89 वर्ग मीटर
कुल क्षेत्रफल: 6,76,946.44 वर्ग मीटर (लगभग 270 बीघे)
यह पूरी जमीन अर्बन सीलिंग एक्ट के अंतर्गत आती है, जिसे न तो बेचा जा सकता है,और न ही निजी उपयोग में लिया जा सकता है। इसके बावजूद भूमाफियाओं और प्रॉपर्टी डीलरों ने इसे निजी संपत्ति की तरह खुलेआम बेच दिया।
निजी संपत्ति की तरह बेची गई सरकारी जमीन
इस मामले में सबसे गंभीर तथ्य यह है,कि Lucknow Land Mafia Case में बिना किसी वैध लेआउट, बिना टाउनशिप योजना पास कराए और बिना एलडीए की अनुमति के प्लाटिंग कर दी गई। आम लोगों को प्लॉट बेचे गए, सड़कें बनाई गईं, बिजली पानी के स्थायी कनेक्शन तक दे दिए गए।
यह सब तब हुआ, जब एलडीए का प्रवर्तन दस्ता कागजों में सक्रिय था, लेकिन ज़मीन पर पूरी तरह निष्क्रिय नजर आया।
प्रवर्तन दस्ता सोता रहा, अवैध कॉलोनियां बसती रहीं
भूमाफियाओं की गतिविधियां कोई एक-दो दिन की नहीं थीं। सालों तक अवैध निर्माण चलता रहा।
Lucknow Land Mafia Case में यह साफ है,कि
कॉलोनियां विकसित होती रहीं
मकान बनते रहे
कुछ जगह बहुमंजिला इमारतें भी खड़ी हो गईं
लेकिन शुरुआती दौर में जिस निर्माण को रोका जा सकता था, उसे जानबूझकर नजरअंदाज किया गया। अब स्थिति यह है,कि कार्रवाई करना प्रशासन के लिए खुद एक चुनौती बन चुका है।
सरकारी जमीन पर कब्जा, कार्रवाई शून्य
मामला सिर्फ अर्बन सीलिंग तक सीमित नहीं है। आरोप हैं,कि इसी क्षेत्र में अन्य सरकारी जमीनों पर भी कब्जा किया गया।
इसके बावजूद
न जिला प्रशासन ने जमीन खाली कराई
न एलडीए ने उसे अपने कब्जे में लेने की कोशिश की
सरकार को न जमीन मिली, न उसका बाजार मूल्य और न ही कोई मुआवजा। Lucknow Land Mafia Case ने सरकारी तंत्र की निष्क्रियता को उजागर कर दिया है।
2008 में एलडीए बना कस्टोडियन, फिर भी विफल
Lucknow Land Mafia Case वर्ष 2008 में शासन ने अर्बन सीलिंग की जमीनों की निगरानी के लिए लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) को कस्टोडियन नियुक्त किया था।
जमीन का मूल स्वामित्व जिला प्रशासन के पास रहा, लेकिन
जिला प्रशासन जमीन नहीं बचा पाया
एलडीए कस्टोडियन की जिम्मेदारी निभाने में विफल रहा
सबसे ज्यादा सवाल प्रवर्तन से जुड़े अधिकारियों की भूमिका पर उठ रहे हैं।
भूमाफिया बने अरबपति, सत्ता तक पहुंच
Lucknow Land Mafia Case में सबसे बड़ा लाभ भूमाफियाओं और प्रॉपर्टी डीलरों को हुआ।
चर्चा है कि
कई भूमाफिया जमीन बेचकर अरबपति बन गए
कुछ लोगों ने इसी अवैध कमाई से राजनीति में प्रवेश किया
सत्ता के गलियारों तक पहुंच बना ली
यही वजह है,कि कार्रवाई का डर उन्हें कभी महसूस नहीं हुआ।
एलडीए का पक्ष क्या कहता है,
Lucknow Land Mafia Case एलडीए के संयुक्त सचिव सुशील प्रताप सिंह का कहना है,
“मैं विहित प्राधिकारी का कार्य देखता हूं। मेरे पास जो भी ध्वस्तीकरण और सीलिंग से जुड़ी फाइलें आईं, उन सभी पर आदेश पारित किए गए। सीलिंग और गिराने की कार्रवाई का निर्देश दिया गया। ठोस कार्रवाई प्रवर्तन विभाग को करनी थी।”
यह बयान एक बार फिर जिम्मेदारी को एक-दूसरे पर डालने की तस्वीर पेश करता है।
अब कार्रवाई होगी या फाइलों में दब जाएगा मामला
आज हालात यह हैं, कि जहां सरकारी जमीन होनी चाहिए थी, वहां लोग रह रहे हैं।
सवाल यह है,कि
क्या प्रशासन अब साहस दिखाएगा?
क्या भूमाफियाओं पर बुलडोजर चलेगा?
या फिर Lucknow Land Mafia Case भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दब जाएगा?
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