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Sambhal Violence Case संभल हिंसा पर बड़ा सवाल: Sambhal Violence Case में FIR आदेश बनाम पुलिस की हाईकोर्ट चुनौती

संभल हिंसा पर कोर्ट बनाम पुलिस: FIR के आदेश को चुनौती देना कानून है या संवैधानिक टकराव

Sambhal Violence Case में CJM के FIR आदेश के बावजूद पुलिस द्वारा मुकदमा दर्ज न करने से संविधान, न्यायिक प्रक्रिया और पुलिस जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के संभल जिले से जुड़ा एक मामला अब केवल हिंसा या पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह न्यायिक आदेशों के पालन, पुलिस जवाबदेही और आम नागरिक के अधिकारों का बड़ा परीक्षण बन गया है। Sambhal Violence Case में जहां मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) ने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का स्पष्ट आदेश दिया, वहीं उस आदेश के अनुपालन के बजाय पुलिस का सीधे हाईकोर्ट पहुंचना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।

यह सवाल सिर्फ कानून का नहीं, बल्कि लोकतंत्र में शक्ति संतुलन का भी है।

Sambhal Violence Case संभल हिंसा पर बड़ा सवाल: Sambhal Violence Case में FIR आदेश बनाम पुलिस की हाईकोर्ट चुनौती

 क्या है पूरा Sambhal Violence Case?

Sambhal Violence Case की शुरुआत 24 नवंबर को हुई उस हिंसा से जुड़ी है, जिसमें याचिकाकर्ता यामीन ने आरोप लगाया कि पुलिस कार्रवाई के दौरान उनके बेटे आलम को तीन गोलियां मारी गईं। यह आरोप सीधे तौर पर पुलिस फायरिंग से नागरिक को गंभीर चोट पहुंचाने का है।

यामीन की शिकायत पर सुनवाई करते हुए CJM विभांशु सुधीर ने मामले को प्रथम दृष्टया गंभीर मानते हुए एएसपी अनुज चौधरी, इंस्पेक्टर अनुज तोमर और 15–20 अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया।

 CJM का आदेश: न्यायिक विवेक का इस्तेमाल

CJM कोर्ट का यह आदेश किसी दबाव या जल्दबाज़ी में नहीं दिया गया था। अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता के तहत यह माना कि लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच के लिए एफआईआर जरूरी है।

यहीं से Sambhal Violence Case एक नई दिशा में चला गया — जहां जांच का विषय पुलिस खुद बन गई।

 FIR दर्ज न करना: क्या यह कोर्ट की अवहेलना है?

सबसे बड़ा और संवेदनशील प्रश्न यही है कि जब एक सक्षम न्यायालय एफआईआर दर्ज करने का आदेश देता है, तो क्या पुलिस अधिकारी उसे लागू न करने का विकल्प चुन सकते हैं?

कानून साफ कहता है:

कोर्ट का आदेश बाध्यकारी होता है

उसका पालन करना हर सरकारी अधिकारी का कर्तव्य है

आदेश की अनदेखी न्यायालय की अवमानना मानी जा सकती है

Sambhal Violence Case में एफआईआर दर्ज न होना, इसीलिए केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि संवैधानिक अनुशासन का सवाल बन गया है।

Sambhal Violence Case संभल हिंसा पर बड़ा सवाल: Sambhal Violence Case में FIR आदेश बनाम पुलिस की हाईकोर्ट चुनौती

 पुलिस का तर्क: पहले हो चुकी है ज्यूडिशियल इंक्वायरी

संभल के एसपी केके विश्नोई ने कहा कि इस हिंसा की पहले ही न्यायिक जांच हो चुकी है, इसलिए एफआईआर की जरूरत नहीं है। इसी आधार पर एएसपी अनुज चौधरी और अन्य पुलिस अधिकारियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिवीजन याचिका दाखिल की।

लेकिन Sambhal Violence Case में यह तर्क कानूनी बहस के घेरे में है, क्योंकि:

न्यायिक जांच और एफआईआर समान नहीं होती

न्यायिक जांच का उद्देश्य तथ्य देखना है, अपराध दर्ज करना नहीं

एफआईआर पीड़ित का संवैधानिक अधिकार है

 क्या पुलिस कानून से ऊपर है?

यह सवाल शायद सबसे कड़ा है। अगर किसी आम नागरिक पर गोली चलती है, तो एफआईआर तुरंत दर्ज होती है। लेकिन जब आरोप पुलिस पर लगे, तो प्रक्रिया बदल जाती है — ऐसा क्यों?

Sambhal Violence Case यह सवाल उठाता है:

क्या पुलिस की वर्दी जवाबदेही से छूट देती है?

क्या आम नागरिक की जान कम मूल्यवान है?

क्या कानून सबके लिए बराबर नहीं रहा?

 हाईकोर्ट जाना अधिकार है, लेकिन क्रम भी कानून तय करता है

पुलिस अधिकारियों को हाईकोर्ट जाने का अधिकार है, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन सामान्य कानूनी सिद्धांत यह भी कहता है कि:

पहले निचली अदालत के आदेश का पालन हो

फिर ऊपरी अदालत से राहत मांगी जाए

यदि हर विभाग आदेश मानने के बजाय उसे टालने लगे, तो न्यायिक व्यवस्था केवल कागज़ों तक सीमित रह जाएगी। Sambhal Violence Case इसी खतरे की ओर इशारा करता है।

 लोकतंत्र और न्यायपालिका की परीक्षा

भारत का संविधान स्पष्ट करता है कि न्यायपालिका सर्वोच्च है। यदि कार्यपालिका उसके आदेशों को लागू करने से इनकार करे, तो यह सीधे लोकतांत्रिक ढांचे पर चोट है।

Sambhal Violence Case में असली सवाल यह नहीं कि कौन दोषी है, बल्कि यह है कि क्या जांच की प्रक्रिया निष्पक्ष रूप से शुरू होने दी जाएगी या नहीं।

 आगे क्या होना चाहिए?

इस मामले में जरूरी है कि:

हाईकोर्ट निष्पक्षता से CJM के आदेश की समीक्षा करे

यह स्पष्ट हो कि एफआईआर दर्ज न करना कानूनसम्मत था या नहीं

यदि आदेश की अवहेलना हुई है, तो जिम्मेदारी तय हो

पीड़ित को न्यायिक भरोसा मिले

Sambhal Violence Case आने वाले समय में पुलिस और अदालतों के रिश्ते की दिशा तय कर सकता है।

न्याय केवल फैसलों से नहीं, बल्कि उनके पालन से मजबूत होता है। अगर अदालत के आदेश लागू ही न हों, तो आम नागरिक का भरोसा टूटता है।

Sambhal Violence Case इस देश के हर नागरिक से जुड़ा सवाल है

क्या कानून सबके लिए एक-सा है?

यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध न्यायिक आदेशों, बयानों और संवैधानिक प्रावधानों पर आधारित है। किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने का उद्देश्य नहीं है। अंतिम निर्णय न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में है।

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