Supreme Court News पासपोर्ट ऑफिस की मनमानी पर सुप्रीम कोर्ट का करारा प्रहार, आज़ादी कोई तोहफा नहीं बल्कि संविधान की पहली जिम्मेदारी
Supreme Court News में बड़ा फैसला, पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए भविष्य की यात्रा या वीजा जानकारी जरूरी नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया
नई दिल्ली। कभी कभी अदालत का एक फैसला पूरे सिस्टम को आईना दिखा देता है। ऐसा ही कुछ इस बार हुआ, जब Supreme Court News में शीर्ष अदालत ने पासपोर्ट प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी करते हुए साफ कहा कि आज़ादी कोई सरकारी तोहफा नहीं, बल्कि संविधान की पहली जिम्मेदारी है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि पासपोर्ट नवीनीकरण के समय भविष्य की यात्रा योजना या वीजा से जुड़ी जानकारी मांगना न केवल अनावश्यक है, बल्कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ भी है।
यह अहम फैसला जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस ए.जी. मसीह की पीठ ने महेश कुमार अग्रवाल की याचिका पर सुनाया। अग्रवाल रांची की एनआईए विशेष अदालत में यूएपीए के तहत चल रहे मामले का सामना कर रहे हैं। जमानत मिलने के बाद उन्होंने अपना पासपोर्ट अदालत में जमा किया था, जिसकी वैधता वर्ष 2023 में समाप्त हो गई। जब अग्रवाल ने पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए आवेदन किया, तो पासपोर्ट ऑफिस ने उनसे भविष्य की यात्रा और वीजा की जानकारी मांगी और इसी आधार पर नवीनीकरण से इनकार कर दिया गया। बाद में कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी इस निर्णय को बरकरार रखा।
Supreme Court News में सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे दृष्टिकोण को गलत ठहराते हुए हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि पासपोर्ट प्राधिकरण का दायरा सीमित है। उसका काम यह जांचना है, कि लंबित आपराधिक मामले के बावजूद संबंधित आपराधिक अदालत ने यात्रा की अनुमति दी है, या नहीं। इसके अलावा किसी तरह की काल्पनिक या भविष्य की जानकारी मांगना अधिकार क्षेत्र से बाहर है। अदालत ने अपने आदेश में संविधान के अनुच्छेद 21 का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता में देश के भीतर और बाहर यात्रा करने का अधिकार भी शामिल है।
Supreme Court News के अनुसार कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा कि कानून के दायरे में रहते हुए हर नागरिक को आजीविका, अवसर और बेहतर जीवन की तलाश की आज़ादी है। राज्य का दायित्व इन अधिकारों की रक्षा करना है, न कि उन्हें प्रशासनिक अड़चनों में उलझाना।
कानूनी जानकारों का मानना है,कि यह फैसला भविष्य में पासपोर्ट नवीनीकरण से जुड़े हजारों मामलों के लिए मिसाल बनेगा। अक्सर देखा गया है,कि लंबित मामलों का हवाला देकर पासपोर्ट से जुड़े अधिकारों को रोक दिया जाता है, जबकि अदालत से यात्रा की अनुमति पहले से मौजूद होती है। Supreme Court News में आया यह फैसला साफ संकेत देता है, कि अब ऐसी मनमानी ज्यादा समय तक नहीं चल पाएगी।
यह निर्णय सिर्फ महेश कुमार अग्रवाल तक सीमित नहीं है, बल्कि आम नागरिकों के लिए भी राहत की खबर है। वैश्विक दौर में शिक्षा, रोजगार और व्यापार के लिए विदेश यात्रा आम जरूरत बन चुकी है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि आज़ादी राज्य की कृपा नहीं बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है, लोकतंत्र की आत्मा को मजबूत करता है। Supreme Court News का यह फैसला लंबे समय तक नागरिक अधिकारों की रक्षा करने वाला एक महत्वपूर्ण न्यायिक दस्तावेज माना जाएगा।
Disclaimer:यह लेख सुप्रीम कोर्ट के आदेश और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तथ्यों पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है। किसी भी कानूनी कदम से पहले संबंधित विशेषज्ञ या अधिवक्ता से सलाह अवश्य लें।