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UAPA Charges  शरजील इमाम उमर खालिद केस: भाषण पर UAPA लगाने पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा सवाल, दिल्ली पुलिस ने बताया क्यों

UAPA Charges शरजील इमाम उमर खालिद पर UAPA क्यों सुप्रीम कोर्ट में उठा बड़ा सवाल और दिल्ली पुलिस का तर्क  भाषण को ‘आतंकी गतिविधि’ मानने पर नई राष्ट्रीय बहस

UAPA Charges सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि भाषण पर UAPA की आतंकी धारा कैसे लगी  दिल्ली पुलिस ने संप्रभुता और आर्थिक सुरक्षा पर हमले का तर्क दिया। 2020 दिल्ली दंगा साजिश केस की पूरी कहानी पढ़ें।

2020 दिल्ली दंगों से जुड़ी जमानत याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार का दिन बेहद अहम रहा। लंबे समय से जेल में बंद उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई पूरी हो गई और अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया। लेकिन सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने एक ऐसा सवाल पूछा जिसने पूरे देश में बहस छेड़ दी “क्या सिर्फ भाषण देने के आधार पर UAPA की धारा 15 जैसी आतंकी धारा लगाई जा सकती है?”

UAPA Charges  शरजील इमाम उमर खालिद केस: भाषण पर UAPA लगाने पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा सवाल, दिल्ली पुलिस ने बताया क्यों

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि UAPA की धारा 15 आमतौर पर देश की संप्रभुता, अखंडता या आर्थिक रणनीतिक सुरक्षा पर सीधे हमले की स्थिति में लगाई जाती है। अदालत के सवाल ने जांच एजेंसी, सरकार और कानूनी विशेषज्ञों सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया।

वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे, जो शरजील इमाम का पक्ष रख रहे थे, ने कहा कि अभियोजन भाषणों का गलत अर्थ निकाल रहा है,और केवल भाषण के आधार पर किसी नागरिक को आतंकवादी घोषित करना लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ है। दवे ने कहा कि अधिकतम गैर कानूनी गतिविधि (धारा 13) और षड्यंत्र (धारा 18) लग सकती हैं, लेकिन UAPA की भारी भरकम धारा 15 लगाना कानून की सीमा को बढ़ाने जैसा है।

शरजील इमाम ने अपने बयान में कहा “मुझे बिना किसी सुनवाई या दोष सिद्धि के ‘बौद्धिक आतंकवादी’ कहा जा रहा है। मैं इस देश का नागरिक हूं, अभी तक किसी अपराध में दोषी नहीं पाया गया हूं।”

दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस ने बिल्कुल स्पष्ट और कठोर तर्क पेश किया। सरकारी पक्ष की ओर से उपस्थित अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने कहा कि मामले को केवल शब्दों तक सीमित नहीं देखा जा सकता। पुलिस के अनुसार, शरजील इमाम का “चिकन नेक ब्लॉक करने” वाला बयान भारत की संप्रभुता को चुनौती था, जबकि उमर खालिद का “चक्का जाम” वाला भाषण भारत की आर्थिक सुरक्षा पर आघात था। ASG ने कहा कि “उनके भाषण सिर्फ विचार नहीं थे, बल्कि संगठित साजिश का हिस्सा थे, जिसके बाद हिंसा हुई। जो कहा गया, वह हुआ।”

इसी आधार पर पुलिस ने UAPA की धारा 15 (आतंकी गतिविधि), धारा 17 (आतंकी फंडिंग), धारा 18 (षड्यंत्र), और आईपीसी की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया। पुलिस का तर्क था कि यह सिर्फ विरोध नहीं था, बल्कि एक व्यापक योजना थी जो फरवरी 2020 के दंगों में दिखाई दी।

दिल्ली दंगों की वह भयावह घटना जिसे देश कभी नहीं भूल सकता 53 लोगों की मौत, 700 से अधिक घायल, कई घर जलकर राख, और अलग अलग इलाकों में फैली हिंसा यह सब इस केस की गंभीरता को और बढ़ाता है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने सितंबर में जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा था कि दंगा “अत्यंत संगठित” था और आरोप गंभीर हैं। इसी आदेश के खिलाफ उमर खालिद, शरजील इमाम और चार अन्य आरोपी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।

अब सवाल यह है, कि आगे क्या सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय सिर्फ इस केस का फैसला नहीं होगा। यह तय करेगा कि भविष्य में:

क्या भाषण को ‘आतंकी गतिविधि’ माना जा सकता है?

UAPA की सीमाएं क्या हैं,

विरोध प्रदर्शन और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे तय होगा

भाषण, असहमति और अभिव्यक्ति को कानून कैसे देखेगा

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है,कि यह फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था में एक ऐतिहासिक मिसाल बनेगा, क्योंकि यह नागरिक अधिकारों और राज्य की सुरक्षा शक्तियों दोनों के भविष्य को दिशा देगा। इसी बीच, देशभर में इस बहस ने गति पकड़ी है,कि यदि भाषण को सीधे तौर पर आतंकी गतिविधि मान लिया गया, तो विरोध और अभिव्यक्ति के अधिकार पर व्यापक असर पड़ेगा। वहीं, पुलिस और सरकार का कहना है,कि इरादे और परिणाम दोनों को एक साथ देखा जाना चाहिए, और इस मामले में नतीजा हिंसा के रूप में सामने आया, इसलिए UAPA Charges लगाना उचित है।

सुप्रीम कोर्ट अब कानूनी तर्कों, दंगों के रिकॉर्ड और दोनों पक्षों के बयानों के आधार पर इस बड़े मामले पर निर्णय सुनाएगा। देशभर की नजरें इस फैसले पर टिकी हैं, क्योंकि यह केस सिर्फ दो व्यक्तियों का नहीं बल्कि कानून, लोकतंत्र, सुरक्षा और स्वतंत्रता चारों स्तंभों को परखने वाला है।

 डिस्क्लेमर यह लेख अदालत में प्रस्तुत तर्कों, सुनवाई के विवरण और सार्वजनिक डेटा के आधार पर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य किसी भी पक्ष का समर्थन या विरोध करना नहीं है। अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ही मान्य होंगे।

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