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Shankaracharya Avimukteshwaranand  संत होने का प्रूफ मांगने पर विवाद, शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का प्रशासन पर तीखा हमला, माघ मेला प्रयागराज

Shankaracharya Avimukteshwaranand संत होने का प्रूफ मांगने पर भड़के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद, बोले सुप्रीम कोर्ट के कंधे पर बंदूक मत रखो

Shankaracharya Avimukteshwaranand प्रयागराज माघ मेले में संत होने का प्रूफ मांगे जाने पर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद भड़क गए। नोटिस, सुप्रीम कोर्ट आदेश, रथ रोके जाने और मौनी अमावस्या विवाद की पूरी रिपोर्ट पढ़ें।

Shankaracharya Avimukteshwaranand  संत होने का प्रूफ मांगने पर विवाद, शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का प्रशासन पर तीखा हमला, माघ मेला प्रयागराज
Shankaracharya Avimukteshwaranand  संत होने का प्रूफ मांगने पर विवाद, शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का प्रशासन पर तीखा हमला, माघ मेला प्रयागराज

प्रयागराज माघ मेला क्षेत्र में संत होने के प्रमाण को लेकर उठा सवाल अब बड़ा विवाद बन चुका है। माघ मेला प्रशासन द्वारा शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से “संत और शंकराचार्य होने का प्रूफ” मांगे जाने के बाद धार्मिक आस्था, प्रशासनिक अधिकार और न्यायिक प्रक्रिया आमने-सामने आ गई है।

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रशासन पर सीधा हमला बोलते हुए कहा,

Shankaracharya Avimukteshwaranand“सुप्रीम कोर्ट के कंधे पर बंदूक रखकर प्रशासन अपनी गलती को छिपाने की कोशिश कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट का गलत हवाला देकर ये लोग कब तक बच पाएंगे?”

Shankaracharya Avimukteshwaranand  संत होने का प्रूफ मांगने पर विवाद, शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का प्रशासन पर तीखा हमला, माघ मेला प्रयागराज

उन्होंने कहा कि संत या शंकराचार्य होने का प्रमाण मांगना न तो प्रशासन का अधिकार है, और न ही सरकार का। यह फैसला केवल परंपरा और शंकराचार्य पीठों के माध्यम से होता है। यह पूरा विवाद Shankaracharya Avimukteshwaranand से जुड़े मामले को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ले आया है।

Shankaracharya Avimukteshwaranand  माघ मेला प्रशासन ने नोटिस जारी कर 24 घंटे के भीतर यह स्पष्ट करने को कहा कि वे खुद को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य किस आधार पर लिख रहे हैं। नोटिस में सुप्रीम कोर्ट के 14 अक्टूबर 2022 के Supreme Court Order का हवाला दिया गया है, जिसमें अंतिम निर्णय तक किसी को भी शंकराचार्य घोषित न करने की बात कही गई है।

प्रशासन का कहना है, कि माघ मेले में लगाए गए शिविर बोर्ड पर “ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य” लिखना अदालत के आदेश की अवहेलना है। इसी आधार पर संत होने के प्रमाण की मांग की गई है।

Shankaracharya Avimukteshwaranand इस पर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने सवाल उठाया कि जब खुद सरकार ने महाकुंभ के दौरान प्रकाशित पत्रिका में उन्हें शंकराचार्य के रूप में प्रस्तुत किया था, तब किसी प्रकार की आपत्ति क्यों नहीं उठाई गई। उन्होंने कहा कि आज अचानक संत होने का प्रूफ मांगना प्रशासन की मंशा पर सवाल खड़े करता है।

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सोमवार रात करीब 12 बजे कानूनगो अनिल कुमार शंकराचार्य के शिविर पहुंचे और नोटिस देने की कोशिश की। शिष्यों ने देर रात नोटिस लेने से इनकार कर दिया। इसके बाद मंगलवार सुबह मेला प्रशासन ने शिविर के गेट पर नोटिस चस्पा कर दिया, जिससे विवाद और गहरा गया।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने दो टूक कहा कि

“संत कौन है और शंकराचार्य कौन होगा, यह निर्णय न प्रशासन करेगा, न सरकार और न ही भारत के राष्ट्रपति।”

Shankaracharya Avimukteshwaranand उन्होंने कहा कि शंकराचार्य वही होता है जिसे अन्य पीठों के शंकराचार्य स्वीकार करते हैं। दो पीठ उन्हें शंकराचार्य मानती हैं, और वे पिछले माघ मेले में उनके साथ संगम स्नान भी कर चुके हैं। यह मामला सीधे तौर पर Jyotir Math Shankaracharya Controversy से जुड़ा हुआ है।

शंकराचार्य ने यह भी ऐलान किया कि जब तक माघ मेला प्रशासन सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगेगा, वे आश्रम में प्रवेश नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि वे हर माघ मेले में प्रयागराज आएंगे, लेकिन ज़रूरत पड़ी तो शिविर की बजाय फुटपाथ पर रहेंगे। यह बयान Magh Mela Prayagraj Dispute को और संवेदनशील बना रहा है।

इस विवाद की जड़ 18 फरवरी, मौनी अमावस्या की घटना मानी जा रही है। उस दिन शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पालकी में बैठकर संगम स्नान के लिए जा रहे थे। पुलिस ने उन्हें पैदल जाने को कहा, लेकिन शिष्यों के आगे बढ़ने पर पुलिस और शिष्यों के बीच धक्का मुक्की और हाथापाई हो गई।

पुलिस ने कई शिष्यों को हिरासत में लिया, जिसके बाद शंकराचार्य धरने पर बैठ गए और रिहाई की मांग करने लगे। करीब दो घंटे तक स्थिति तनावपूर्ण रही। अंततः पुलिस ने पालकी को संगम से लगभग एक किलोमीटर दूर ले जाकर खड़ा कर दिया।

Shankaracharya Avimukteshwaranand अब यह विवाद सिर्फ एक संत या प्रशासन तक सीमित नहीं रहा। यह धार्मिक परंपरा, संतों की गरिमा और प्रशासनिक अधिकारों की सीमा को लेकर एक बड़ा सवाल बन चुका है। आने वाले दिनों में इस मामले पर कानूनी और सामाजिक स्तर पर और टकराव की संभावना जताई जा रही है।

यह समाचार सार्वजनिक बयानों, प्रशासनिक नोटिस और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार संबंधित पक्षों के हैं। किसी भी कानूनी निष्कर्ष के लिए सुप्रीम कोर्ट या सक्षम न्यायालय के अंतिम निर्णय को ही अंतिम और मान्य माना जाएगा।

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