Moin Khan case दोषमुक्त मोईन ख़ान, सत्ता की ज़िद और मीडिया की चुप्पी क्या योगी सरकार और मीडिया को जवाबदेही तय करनी होगी
Moin Khan case मोईन ख़ान को अदालत ने दोषमुक्त किया, लेकिन योगी सरकार ने बुलडोज़र चलाया और मीडिया ने छवि बिगाड़ी। क्या माफ़ी और पुनर्निर्माण होगा?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जब भी ‘कानून व्यवस्था’ और ‘अपराध के ख़िलाफ़ सख़्ती’ की बात होती है, तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नाम सबसे पहले सामने आता है। लेकिन जब वही सख़्ती किसी निर्दोष व्यक्ति पर टूट पड़े, तो सवाल सिर्फ़ सरकार पर ही नहीं, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया पर भी उठते हैं। Moin Khan case ने आज ऐसे ही कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं।
जिस मोईन ख़ान को मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक मंचों से अपराध का प्रतीक बताकर पेश किया, जिसके नाम पर भारतीय जनता पार्टी ने समाजवादी पार्टी के ख़िलाफ़ राजनीतिक अभियान चलाया, उसी मोईन ख़ान को अदालत ने दोषमुक्त कर दिया। इसके बावजूद उनके जीवन पर जो ज़ख़्म लगे, क्या उनकी भरपाई संभव है?
अदालत का फैसला और सत्ता का मौन
अदालत का निर्णय साफ़ है मोईन ख़ान किसी भी आपराधिक कृत्य में दोषी नहीं पाए गए। Moin Khan case में न्यायपालिका ने तथ्यों और सबूतों के आधार पर यह स्पष्ट कर दिया कि आरोप टिकाऊ नहीं थे। लेकिन सवाल यह है कि जब अदालत ने सच्चाई सामने रख दी, तो सत्ता की ओर से सार्वजनिक रूप से स्वीकारोक्ति क्यों नहीं आई?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिन आरोपों को बार बार दोहराया, वे अब न्यायिक कसौटी पर गलत साबित हो चुके हैं। क्या ऐसे में माफ़ी मांगना नैतिक और संवैधानिक ज़िम्मेदारी नहीं बनती?
बुलडोज़र कार्रवाई: न्याय से पहले सज़ा
मोईन ख़ान के घर पर बुलडोज़र चलाया गया। यह कार्रवाई सिर्फ़ एक मकान गिराने तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह पूरे परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा, सुरक्षा और भविष्य पर हमला था। Moin Khan case ने यह सवाल मजबूती से उठाया है कि क्या प्रशासन को अदालत के फैसले से पहले किसी नागरिक को दोषी मानने का अधिकार है?
अगर कोई व्यक्ति निर्दोष साबित हो चुका है, तो क्या सरकार की यह ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि वह बुलडोज़र से गिराए गए घर को दोबारा बनवाए या उचित मुआवज़ा दे?
राजनीतिक लाभ और बीजेपी का अभियान
बीजेपी ने मोईन ख़ान का नाम लेकर समाजवादी पार्टी को घेरने की कोशिश की। चुनावी मंचों और बयानों में उन्हें ‘अपराधी चेहरा’ बनाकर पेश किया गया। Moin Khan case में अदालत के फैसले के बाद यह साफ़ हो गया कि राजनीतिक लाभ के लिए एक व्यक्ति की छवि को जानबूझकर नुकसान पहुंचाया गया।
लोकतंत्र में विपक्ष पर हमला करना राजनीतिक अधिकार हो सकता है, लेकिन किसी निर्दोष नागरिक को मोहरा बनाना क्या स्वीकार्य है?
मीडिया की भूमिका: सवाल पूछने की जगह उकसावे की भाषा
मुख्यधारा मीडिया ने इस पूरे मामले में तथ्यों की पड़ताल करने के बजाय हिंदू-मुसलमान की बहस को हवा दी। कई चैनलों और अख़बारों ने सरकारी दावों को बिना जांचे परखे परोसा। Moin Khan case में मीडिया का यह रवैया उसकी निष्पक्षता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
जब अदालत ने मोईन ख़ान को दोषमुक्त किया, तब वही मीडिया संस्थान खामोश क्यों हो गए जिन्होंने पहले उन्हें अपराधी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी?
क्या माफ़ी ही काफी है
यह सिर्फ़ माफ़ी मांगने का सवाल नहीं है। यह सवाल जवाबदेही का है। Moin Khan case यह मांग करता है कि
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगें।
मीडिया अपने भ्रामक और विभाजनकारी कवरेज के लिए आत्ममंथन करे।
यूपी सरकार बुलडोज़र से गिराए गए घर का पुनर्निर्माण कराए या उचित मुआवज़ा दे।
न्याय, लोकतंत्र और भविष्य
अगर सत्ता और मीडिया अपनी गलती स्वीकार नहीं करते, तो यह मामला सिर्फ़ मोईन ख़ान तक सीमित नहीं रहेगा। Moin Khan case भविष्य में किसी भी आम नागरिक के साथ दोहराया जा सकता है। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि सरकार, राजनीति और मीडिया तीनों न्याय के सामने झुकें।