NRC West Bengal Ground Report पश्चिम बंगाल NRC मामला: 70 वर्षीय ज़फर अली की नागरिकता की लड़ाई

Written by: akhtar husain

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NRC West Bengal Ground Report पश्चिम बंगाल में NRC और ज़फर अली की पीड़ा: 70 साल एक इंसान, एक संदूक और एक सवाल

70 साल की उम्र।

हाथों में काग़ज़ों का पुलिंदा।

एक भारी संदूक।

और आँखों में थकान, डर और अपमान की चुप चीख।

यह दृश्य किसी अपराधी का नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर निवासी ज़फर अली का है।

उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है और NRC West Bengal को लेकर पूरे देश को झकझोर रहा है।

जिस देश में उन्होंने ज़िंदगी गुज़ारी, उसी देश में आज उन्हें यह साबित करना पड़ रहा है कि वे “भारतीय” हैं।

 ज़फर अली का मामला क्यों पूरे सिस्टम पर सवाल खड़ा करता है

ज़फर अली के पास आधार कार्ड है।

वोटर आईडी है।

राशन कार्ड है।

स्थानीय दस्तावेज़ हैं।

बस एक जन्म प्रमाण पत्र नहीं है

और यही कमी उन्हें संदेह के घेरे में ले आई।

NRC West Bengal की सुनवाई के दौरान 70 वर्षीय ज़फर अली अपने दस्तावेज़ों के साथ SIR के चक्कर लगाते दिखे।

यह दृश्य केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की तस्वीर है जहाँ काग़ज़ इंसान से बड़ा हो गया है।

ग्रामीण भारत में जन्म प्रमाण पत्र न होना कोई असामान्य बात नहीं।

लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि बुज़ुर्ग नागरिकों को उम्र के इस पड़ाव पर अपनी पहचान साबित करनी पड़े?

 NRC का उद्देश्य और ज़मीनी सच्चाई

NRC का उद्देश्य अवैध घुसपैठ को रोकना बताया जाता है।

लेकिन NRC West Bengal जैसे मामलों में ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है।

जब प्रक्रिया इतनी जटिल हो जाए कि

गरीब, बुज़ुर्ग और अशिक्षित लोग उसमें उलझ जाएँ

तो सवाल नीति पर उठता है, न कि नागरिक पर।

नागरिकता कोई इनाम नहीं, बल्कि संविधान प्रदत्त अधिकार है।

और इस अधिकार को साबित करने के लिए इंसान को अपमानित होना पड़े,

तो यह लोकतंत्र के लिए चेतावनी है।

NRC West Bengal Ground Report पश्चिम बंगाल NRC मामला: 70 वर्षीय ज़फर अली की नागरिकता की लड़ाई
NRC West Bengal Ground Report पश्चिम बंगाल NRC मामला: 70 वर्षीय ज़फर अली की नागरिकता की लड़ाई

 लोकतंत्र में डर नहीं, भरोसा होना चाहिए

ज़फर अली की आँखों में जो थकान है,

वह सिर्फ़ उम्र की नहीं

वह डर की है, असुरक्षा की है।

NRC West Bengal का यह मामला बताता है कि

जब राज्य अपने ही नागरिकों को शक की नज़र से देखने लगे,

तो भरोसा टूटता है।

लोकतंत्र काग़ज़ों से नहीं चलता,

वह भरोसे, संवेदनशीलता और न्याय से चलता है।

70 साल का बुज़ुर्ग अगर यह सोचने पर मजबूर हो जाए कि

“कहीं मुझे अपने ही देश से बाहर न कर दिया जाए”,

तो यह सिस्टम की असफलता है।

 वायरल वीडियो और समाज की जिम्मेदारी

ज़फर अली का वीडियो केवल एक वायरल क्लिप नहीं है।

यह एक सवाल है

जो हर संवेदनशील नागरिक से पूछा जा रहा है।

आज ज़फर अली हैं,

कल कोई और होगा।

NRC West Bengal जैसे मुद्दों पर चुप्पी,

आख़िरकार लोकतंत्र को कमज़ोर करती है।

समाज का काम नफरत चुनना नहीं,

बल्कि इंसान के साथ खड़ा होना है।

 आगे का रास्ता  संविधान और संवेदना

सरकार और प्रशासन को यह समझना होगा कि

हर नागरिक फ़ाइल नंबर नहीं होता।

NRC West Bengal की प्रक्रिया में

बुज़ुर्गों और कमजोर वर्गों के लिए

मानवीय और सरल व्यवस्था जरूरी है।

नागरिकता काग़ज़ों से नहीं,

इंसान की ज़िंदगी, उसके योगदान और उसकी जड़ों से तय होती है।

अगर यह बात भूल गए,

तो हम सिर्फ़ एक सिस्टम नहीं,

अपना लोकतंत्र खो देंगे।

यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी, वायरल वीडियो और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर लिखा गया है।

किसी व्यक्ति, समुदाय या संस्था को दोषी ठहराना उद्देश्य नहीं है।

यह कंटेंट केवल सूचना, जनहित और लोकतांत्रिक विमर्श के लिए है।

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akhtar husain

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