gulafsha story rights justice गुलफशा की ख़ामोशी पाँच साल से सलाखों में बंद वो लड़की जिसने सिर्फ़ अपने हक़ की बात की थी

Written by: akhtar husain

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gulafsha story rights justice गुलफशा की ख़ामोशी पाँच साल से सलाखों में बंद वो लड़की जिसने सिर्फ़ अपने हक़ की बात की थी

gulafsha story rights justice गुलफशा, जिसने नागरिकता कानून के विरोध में अपने हक़ की बात की, पाँच साल से जेल में है। सवाल ये है, क्या हक़ मांगना अब भी गुनाह है?

gulafsha story rights justice वो लड़की जिसने सिर्फ़ संविधान पर भरोसा किया

gulafsha story rights justice गुलफशा की ख़ामोशी पाँच साल से सलाखों में बंद वो लड़की जिसने सिर्फ़ अपने हक़ की बात की थी
gulafsha story rights justice गुलफशा की ख़ामोशी पाँच साल से सलाखों में बंद वो लड़की जिसने सिर्फ़ अपने हक़ की बात की थी

गुलफशा एक ऐसी लड़की थी जिसने अपने दिल में संविधान की इज़्ज़त रखी।

वो सड़कों पर इसलिए उतरी क्योंकि उसे विश्वास था कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहाँ हर नागरिक को बोलने, सवाल करने और विरोध करने का अधिकार है।

gulafsha story rights justice गुलफशा की ख़ामोशी पाँच साल से सलाखों में बंद वो लड़की जिसने सिर्फ़ अपने हक़ की बात की थीलेकिन जब उसने नागरिकता कानून (CAA) के खिलाफ अपनी राय रखी, तब उसके हाथों में तख़्ती थी  हथियार नहीं।

आज पाँच साल बीत गए हैं, लेकिन गुलफशा अभी भी जेल की सलाखों के पीछे है।

क्या एक बेटी का अपने देश के कानून पर भरोसा करना गुनाह बन गया है?

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 आज़ादी की नींव में भी उनका खून शामिल था

gulafsha story rights justice जब हम आज़ादी की बात करते हैं, तो यह याद रखना ज़रूरी है,कि इस देश की मिट्टी में हर धर्म का लहू मिला है।

स्वतंत्रता संग्राम में मुसलमानों, हिंदुओं, सिखों और ईसाइयों  सबने कुर्बानियाँ दीं।

लेकिन आज, उसी देश में अगर कोई मुसलमान लड़की अपने हक़ की बात करती है, तो उसे “देशविरोधी” कहकर जेल भेज दिया जाता है।

यह सवाल सिर्फ़ गुलफशा का नहीं है, यह सवाल भारत के संविधान की आत्मा का है।

क्योंकि जब न्याय देर से मिलता है, तो वो अन्याय बन जाता है।

 पाँच साल की ख़ामोशी, फिर भी ज़िंदा है उम्मीद

gulafsha story rights justice गुलफशा की माँ रोज़ अल्लाह से एक ही दुआ माँगती हैं, “मेरी बेटी को इंसाफ़ मिल जाए।”

हर तारीख़ पर वो अदालत जाती हैं, हर बार नई तारीख़ मिलती है, लेकिन जमानत नहीं।

क्या पाँच साल एक लड़की की आवाज़ को कुचलने के लिए काफी नहीं हैं?

फिर भी, उम्मीद की एक किरण बाकी है,

क्योंकि भारत का संविधान अब भी जिंदा है, और इंसानियत की रूह अब भी सांस ले रही है।

  न्याय किसी धर्म का मोहताज नहीं

यह मुद्दा सिर्फ़ एक मज़हब का नहीं है।

अगर आज गुलफशा जेल में है, तो कल कोई और हो सकता है, चाहे वो किसी भी धर्म का क्यों न हो।

gulafsha story rights justice संविधान का मज़बूती से पालन तभी संभव है, जब इंसाफ़ सबके लिए बराबर हो।

धर्म से ऊपर उठकर हमें यह समझना होगा कि “देशभक्ति नफरत नहीं, न्याय से प्रेम है।”

गुलफशा का संघर्ष हमें यही सिखाता है, कि सच्चा देशप्रेम वह है जो अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत रखे।

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 हम सबकी ज़िम्मेदारी आवाज़ उठाना

gulafsha story rights justice  अगर आज हम चुप रहेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ भी डर में जिएंगी।
हर नागरिक, हर युवा को यह समझना होगा कि गुलफशा की लड़ाई हमारी भी लड़ाई है,

संविधान, समानता और इंसानियत की लड़ाई।
वो आवाज़ जो पाँच साल से कैद है, उसे बाहर लाना हमारा कर्तव्य है।

क्योंकि जब तक इंसाफ़ हर नागरिक को नहीं मिलेगा, तब तक यह देश पूरी तरह आज़ाद नहीं कहलाएगा।

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 Disclaimer:

यह लेख किसी राजनीतिक दल या विचारधारा के पक्ष या विरोध में नहीं है।

इसका उद्देश्य केवल एक संवेदनशील मुद्दे पर मानवता और संवैधानिक अधिकारों की बात करना है।

लेख का मकसद समाज को यह याद दिलाना है,कि न्याय, समानता और इंसानियत  यही सच्चे भारत की पहचान हैं।

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akhtar husain

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