अनकही कहानी Ali Musliyar मालाबार का मौलवी जिसने अंग्रेज़ी हुकूमत को हिला दिया
Ali Musliyar की अनकही कहानी। 1921 के मालाबार विद्रोह में अंग्रेज़ों और ज़मींदारी सिस्टम के खिलाफ खड़े मौलवी Ali Musliyar को 1922 में फांसी क्यों दी गई, पढ़िए पूरा इतिहास।
इतिहास अक्सर विजेताओं की आवाज़ में लिखा जाता है। जो सत्ता के अनुकूल न हो, जो स्थापित व्यवस्था को चुनौती दे, वह धीरे धीरे किताबों के हाशिए पर चला जाता है। केरल के मालाबार क्षेत्र में जन्मे Ali Musliyar (1874–1922) ऐसे ही एक व्यक्तित्व थे, जिनकी कहानी आज़ादी के संघर्ष में अहम होने के बावजूद मुख्यधारा के इतिहास से लगभग गायब है।
Ali Musliyar कोई राजा नहीं थे, न उनके पास कोई ताज था और न ही कोई संगठित सेना। वे एक साधारण मौलवी थे, लेकिन उनके विचारों की ताकत और अन्याय के खिलाफ खड़े होने का साहस अंग्रेज़ी शासन के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया।
ब्रिटिश भारत और मालाबार की पृष्ठभूमि
बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में मालाबार क्षेत्र ब्रिटिश शासन और ज़मींदारी व्यवस्था के दोहरे अत्याचार से जूझ रहा था। अंग्रेज़ों द्वारा संरक्षित ज़मींदार किसानों से मनमाना लगान वसूलते थे। ज़मीनें छीनी जाती थीं और विरोध करने वालों को कुचला जाता था।
किसानों की हालत बदतर थी। न्याय की कोई सुनवाई नहीं, प्रशासन पूरी तरह अंग्रेज़ों और उनके समर्थक ज़मींदारों के पक्ष में खड़ा था। इसी माहौल में Ali Musliyar जैसे लोगों की आवाज़ उभरी।
मौलवी से आंदोलनकारी तक
Ali Musliyar धार्मिक शिक्षा से जुड़े हुए थे, लेकिन वे सिर्फ मस्जिद तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने देखा कि अन्याय केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि नैतिक प्रश्न भी है। उनके लिए चुप रहना गुनाह के बराबर था।
उन्होंने साफ कहा
“गुलामी के साथ जीना, ज़िंदा रहने से बदतर है।”
यह विचार मालाबार के गरीब किसानों के दिलों में उतर गया। उन्होंने लोगों को संगठित किया, उन्हें उनके अधिकारों का एहसास कराया और ज़मींदारी शोषण के खिलाफ खड़ा होने का साहस दिया।
1921: जब मालाबार उबल पड़ा
1921 में हालात विस्फोटक हो गए। किसानों और स्थानीय लोगों ने ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ खुला विरोध शुरू कर दिया। कई जगहों पर ब्रिटिश पुलिस चौकियों पर हमले हुए, प्रशासनिक ढांचे को नुकसान पहुंचा और अंग्रेज़ी हुकूमत पहली बार इस क्षेत्र में डगमगाती नजर आई।
ब्रिटिश अधिकारियों के लिए Ali Musliyar सिर्फ एक धार्मिक नेता नहीं रहे, बल्कि वे उस विद्रोह का चेहरा बन गए, जो सत्ता की जड़ों को हिला रहा था।
अंग्रेज़ों की सख्ती और गिरफ्तारी
ब्रिटिश शासन ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए कठोर कदम उठाए। बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं, गांवों में दमन अभियान चलाया गया। अंततः Ali Musliyar को भी गिरफ्तार कर लिया गया।
उन पर अंग्रेज़ी सत्ता के खिलाफ विद्रोह भड़काने का आरोप लगाया गया। मुकदमा चला, लेकिन यह मुकदमा न्याय से अधिक सत्ता का प्रदर्शन था।
1922: फांसी और खामोशी
1922 में Ali Musliyar को फांसी दे दी गई।
न कोई बड़ा भाषण,
न कोई राष्ट्रीय शोक,
न कोई सरकारी श्रद्धांजलि।
उनकी मौत के साथ अंग्रेज़ों ने सिर्फ एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि एक विचार को दबाने की कोशिश की। आज़ादी के बाद भी उनका नाम धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों से गायब होता चला गया।
इतिहास से क्यों गायब हो गए Ali Musliyar?
इसके कई कारण माने जाते हैं।
वे सत्ता के लिए “असुविधाजनक” थे
उन्होंने केवल अंग्रेज़ों को नहीं, बल्कि उनके बनाए ज़मींदारी सिस्टम को भी चुनौती दी
आज़ादी के बाद जो इतिहास लिखा गया, उसमें ऐसे विद्रोहियों के लिए सीमित जगह थी
कुछ इतिहासकारों का मानना है, कि अगर Ali Musliyar किसी और पृष्ठभूमि से होते, तो शायद आज उनके नाम पर सड़कें, संस्थान और स्मारक होते।
इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं होता
Ali Musliyar की कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है, कि इतिहास सिर्फ वही नहीं होता, जो हमें पढ़ाया जाता है। इतिहास वह भी होता है, जिसे जानबूझकर दबा दिया जाता है।
वे नायक थे या विद्रोही इस पर बहस हो सकती है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि वे अन्याय के खिलाफ खड़े होने का साहस रखने वाले व्यक्ति थे।
आज के लिए क्या संदेश छोड़ गए Ali Musliyar
Ali Musliyar की विरासत हमें यह सिखाती है,कि सत्ता के सामने सच बोलने के लिए पद, ताज या हथियार नहीं चाहिए सिर्फ रीढ़ चाहिए। उनका जीवन बताता है,कि सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा की लड़ाई हर दौर में प्रासंगिक रहती है।
निष्कर्ष
Ali Musliyar की कहानी आज भी सवाल पूछती है,
क्या हम अपने इतिहास को पूरी ईमानदारी से जानते हैं?
और क्या हम उन आवाज़ों को जगह देने को तैयार हैं, जिन्हें कभी दबा दिया गया था?
इंकलाब के माध्यम से देश की आजादी में शहीद होने वाले अपनी मातृभूमि पर कुर्बानी देने वाले ऐसे ही शहीदों की असली दास्तान हम आप तक पहुंचाएंगे इंकलाब सच को सामने लाएगा और भारत की आवाम को उन शहीदों से रूबरू कराएगी जिन्हें इतिहास के पन्नों से मिटा दिया गया
शायद अब वक्त है कि ऐसी अनकही कहानियों को सामने लाया जाए।