बिना FIR हिरासत, मारपीट और अवैध चालान पर न्यायालय सख्त, Bulandshahr Police Custody Case में चौकी प्रभारी समेत छह पुलिसकर्मी तलब
यूपीएससी अभ्यर्थी को फर्जी हिरासत में लेने का मामला। Bulandshahr Police Custody Case में जिला जज ने छह पुलिसकर्मियों को 13 फरवरी को पेश होने का आदेश दिया।
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले से सामने आया यह मामला पुलिस की कार्यप्रणाली, नागरिक अधिकारों और कानून के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। खुर्जा नगर कोतवाली क्षेत्र में यूपीएससी की तैयारी कर रहे एक छात्र और उसके भाई को कथित रूप से बिना एफआईआर हिरासत में लेने, मारपीट करने और नियमों के विरुद्ध चालान करने के आरोपों पर जिला जज ने कड़ा रुख अपनाया है। यह पूरा प्रकरण अब Bulandshahr Police Custody Case के रूप में जाना जा रहा है।
याचिका में क्या लगाए गए आरोप
खुर्जा के नव दुर्गा गली संख्या पांच निवासी प्रिंस भारद्वाज ने न्यायालय में दाखिल याचिका में बताया कि वह यूपीएससी की तैयारी कर रहे हैं। उनके अनुसार, 1 सितंबर 2025 को एक युवती ने पुरानी व्यक्तिगत रंजिश के चलते उनके और उनके भाई शिव भारद्वाज के खिलाफ मारपीट और एससी एसटी एक्ट के तहत झूठी तहरीर दी। आरोप है कि शिकायत की निष्पक्ष जांच किए बिना ही पुलिस ने दोनों भाइयों को हिरासत में ले लिया, जिससे Bulandshahr Police Custody Case की नींव पड़ी।
बिना FIR हिरासत में लेकर की गई कार्रवाई
पीड़ितों का दावा है कि पुलिस ने पहले किसी भी तरह की प्राथमिकी दर्ज नहीं की और सीधे हिरासत में ले लिया। इसके बाद शांति भंग की धारा में चालान कर दिया गया और फिर मुख्य रिपोर्ट दर्ज की गई। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि जिन धाराओं में कार्रवाई की गई, उनमें तत्काल गिरफ्तारी का प्रावधान नहीं है। यही वजह है कि Bulandshahr Police Custody Case में पुलिस की भूमिका संदेह के घेरे में है।
जिला जज का कड़ा संदेश
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला जज ने तत्कालीन चौकी प्रभारी समेत छह नामजद और तीन अज्ञात पुलिसकर्मियों को तलब किया है। अदालत ने साफ निर्देश दिए हैं कि सभी आरोपी पुलिसकर्मी 13 फरवरी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखें। न्यायिक जानकारों का मानना है कि Bulandshahr Police Custody Case पुलिस जवाबदेही तय करने की दिशा में अहम कदम हो सकता है।
कानून क्या कहता है
कानून विशेषज्ञों के अनुसार, बिना एफआईआर हिरासत में लेना और मारपीट करना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। किसी भी नागरिक की स्वतंत्रता केवल विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत ही सीमित की जा सकती है। यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो Bulandshahr Police Custody Case में संबंधित पुलिसकर्मियों पर विभागीय और कानूनी कार्रवाई संभव है।
आम नागरिकों के अधिकारों पर असर
यह मामला सिर्फ दो भाइयों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि यदि कानून की प्रक्रिया का पालन न हो तो आम नागरिक कितनी आसानी से उत्पीड़न का शिकार हो सकता है। Bulandshahr Police Custody Case पुलिस और जनता के बीच भरोसे की खाई को भी उजागर करता है।
आगे की कार्रवाई पर टिकी निगाहें
अब सबकी नजर 13 फरवरी को होने वाली सुनवाई पर टिकी है। अदालत में पुलिसकर्मियों की व्यक्तिगत पेशी यह तय करेगी कि आगे जांच किस दिशा में बढ़ेगी। Bulandshahr Police Custody Case आने वाले समय में पुलिस सुधार और जवाबदेही की बहस को और तेज कर सकता है।
यह लेख न्यायालय में दायर याचिका, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तथ्यों और कानूनी विश्लेषण पर आधारित है। सभी आरोपी तब तक निर्दोष माने जाते हैं जब तक सक्षम न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध न किया जाए। लेख का उद्देश्य केवल सूचना देना है।