Democracy Under Threat लोकतंत्र को सूली पर चढ़ाने की खुली धमकियां जब कानून मौन हो जाए तो देश सवाल पूछता है
Democracy Under Threat संविधान और अंबेडकरवादी विचारधारा को खुलेआम धमकियां दी जा रही हैं। कानून की निष्क्रियता ने लोकतंत्र पर गंभीर संकट खड़ा कर दिया है।पढ़िए पूरी पड़ताल।
मुझे लगता है,कि आज का भारत एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुका है, जहां लोकतंत्र केवल संविधान की प्रस्तावना तक सीमित होता जा रहा है, और ज़मीनी हकीकत डर, धमकी और चुप्पी से भरी दिखाई देती है। जब कोई व्यक्ति या समूह खुलेआम संविधान समर्थक विचारधाराओं को धमकी देता है और कानून मूकदर्शक बना रहता है, तब यह कहना गलत नहीं कि Democracy Under Threat केवल एक राजनीतिक शब्द नहीं, बल्कि एक गंभीर राष्ट्रीय स्थिति बन चुकी है।
हाल के समय में सामने आए कुछ बयान और वीडियो इस चिंता को और गहरा करते हैं। इनमें एक व्यक्ति कानून को ही चुनौती देता नजर आता है, मानो उसे किसी कार्रवाई का डर ही न हो। सबसे गंभीर बात यह है,कि ये धमकियां अंबेडकरवादी विचारधारा से जुड़े लोगों को दी जा रही हैं, यानी उन नागरिकों को जो संविधान, समानता और सामाजिक न्याय की बात करते हैं। यह सीधे सीधे लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला है।
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने जिस संविधान की नींव रखी थी, उसका मूल उद्देश्य यही था कि भारत में कानून सर्वोच्च होगा। लेकिन आज तस्वीर इसके उलट दिख रही है। जब कानून के सामने खड़े होकर कानून को ही धमकी दी जाए और कोई सख्त कार्रवाई न हो, तो आम नागरिक के मन में यह सवाल उठता है, कि क्या कानून अब सभी के लिए समान है। यही स्थिति Democracy Under Threat को और मजबूती देती है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है,कि धमकी देने वाले न तो छिप रहे हैं,और न ही माफी मांग रहे हैं। वे खुलेआम अपनी बात कह रहे हैं। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर उनके हौसले इतने बुलंद क्यों हैं। क्या उन्हें सत्ता का अप्रत्यक्ष संरक्षण प्राप्त है, या फिर कानून का डर पूरी तरह समाप्त हो चुका है। दोनों ही स्थितियां लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक हैं।
अंबेडकरवादी विचारधारा हमेशा से सवाल पूछती रही है। यह विचारधारा सत्ता के केंद्रीकरण, सामाजिक असमानता और अन्याय के खिलाफ खड़ी रही है। शायद यही कारण है, कि कुछ कट्टर मानसिकताएं इसे खतरे के रूप में देखती हैं। जब यह असहजता धमकी और डर में बदल जाती है, तब साफ हो जाता है,कि Democracy Under Threat केवल वैचारिक संघर्ष नहीं, बल्कि संवैधानिक संकट बन चुका है।
सोशल मीडिया पर कई जागरूक नागरिकों ने इस पूरे मामले पर चिंता जताई है। लोग पूछ रहे हैं, कि अगर आज संविधान की बात करने वालों को डराया जा सकता है, तो कल आम नागरिक की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी। लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वही होती है, जब नागरिक बोलने से डरने लगें और कानून से भरोसा उठने लगे।
कानून की भूमिका सिर्फ अपराध के बाद कार्रवाई करने तक सीमित नहीं होती, बल्कि समाज में भरोसा बनाए रखना भी उसका दायित्व है। जब यह भरोसा कमजोर पड़ता है, तब लोकतंत्र की नींव हिलने लगती है। आज यही भरोसा सवालों के घेरे में है,और यही वजह है, कि देशभर में यह चर्चा तेज हो रही है, कि Democracy Under Threat को अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
न्यायपालिका और प्रशासन से यह अपेक्षा की जाती है,कि वे बिना किसी दबाव के निष्पक्ष कार्रवाई करें। जब कानून को खुली चुनौती दी जाती है और फिर भी कार्रवाई नहीं होती, तो यह एक खतरनाक उदाहरण बनता है। इससे समाज में यह धारणा बनती है कि ताकतवर के लिए अलग नियम हैं और कमजोर के लिए अलग, जो लोकतंत्र की आत्मा के खिलाफ है।
इतिहास बताता है कि लोकतंत्र का पतन अचानक नहीं होता। यह धीरे-धीरे होता है,पहले शब्दों से, फिर डर से और अंत में चुप्पी से। जब लोग बोलना बंद कर देते हैं, और संस्थाएं निष्क्रिय हो जाती हैं, तभी लोकतंत्र वास्तव में कमजोर पड़ता है। आज भारत उसी चेतावनी के दौर से गुजर रहा है, जहां Democracy Under Threat को समय रहते समझना बेहद जरूरी है।
Democracy Under Threat आज सबसे बड़ा सवाल यही है,कि क्या हमारा सिस्टम अब भी इतना मजबूत है कि वह संविधान पर हुए इन हमलों का जवाब दे सके। क्या कानून अपनी जिम्मेदारी निभाएगा, या फिर लोकतंत्र यूं ही सूली पर टंगा रहेगा और देश सवाल ही पूछता रह जाएगा। यह सवाल सिर्फ सरकार या अदालत का नहीं, बल्कि हर उस नागरिक का है,जो भारत को एक मजबूत लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में देखना चाहता है।
जब तक इन सवालों के ठोस और ईमानदार जवाब नहीं मिलते, तब तक यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत में Democracy Under Threat एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक गंभीर परीक्षा बन चुकी है।
Disclaimer यह आर्टिकल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सूचनाओं, सोशल मीडिया पर सामने आए बयानों और घटनाओं के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें व्यक्त किए गए विचार किसी व्यक्ति, संस्था या समुदाय के विरुद्ध दुर्भावना रखने के उद्देश्य से नहीं हैं। लेख का उद्देश्य लोकतांत्रिक मूल्यों, संविधान और कानून के राज से जुड़े सवालों को उजागर करना है। किसी भी प्रकार की कानूनी जिम्मेदारी संबंधित अधिकारिक जांच और न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करती है।
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