Food Adulteration in Gorakhpur: ऑरामाइन से रंगा भुना चना जब्त, 730 बोरी सील

Written by: akhtar husain

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Food Adulteration in Gorakhpur: सेहत के नाम पर जहर, गोरखपुर में ऑरामाइन से रंगा 730 बोरी भुना चना जब्त, 18 लाख का स्टॉक सील

 Food Adulteration in Gorakhpur का बड़ा खुलासा। गोरखपुर में खाद्य विभाग ने ऑरामाइन केमिकल से रंगा 730 बोरी भुना चना जब्त किया, कीमत करीब 18 लाख रुपये।

अगर आप रोज सुबह या शाम सेहत बनाने के लिए भुना चना खाते हैं, तो यह खबर आपको अंदर तक झकझोर देगी। आम आदमी जिस चने को ताकत और पोषण का भरोसेमंद जरिया मानता है, वही अब बीमारियों का कारण बन सकता है। गोरखपुर में सामने आया ताजा मामला बताता है,कि Food Adulteration in Gorakhpur किस हद तक फैल चुका है, और कैसे मुनाफे के लिए लोगों की सेहत से खिलवाड़ किया जा रहा है।

Food Adulteration in Gorakhpur: ऑरामाइन से रंगा भुना चना जब्त, 730 बोरी सील
Food Adulteration in Gorakhpur: ऑरामाइन से रंगा भुना चना जब्त, 730 बोरी सील

सोमवार को खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग की टीम ने गोरखपुर के लालडिग्गी इलाके में स्थित एक गोदाम पर सूचना के आधार पर छापा मारा। छापेमारी के दौरान टीम को भारी मात्रा में भुना चना मिला, जिसे जांच के लिए मौके पर ही परखा गया। विभाग की अत्याधुनिक मोबाइल लैब ‘फूड सेफ्टी ऑन व्हील्स’ से की गई प्राथमिक जांच में चने में ऑरामाइन केमिकल की पुष्टि हुई। यह एक प्रतिबंधित और अत्यंत जहरीला रसायन है, जिसका खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल पूरी तरह गैरकानूनी है। Food Adulteration in Gorakhpur के इस मामले ने अधिकारियों को भी चौंका दिया।

जांच के बाद विभाग ने तुरंत कार्रवाई करते हुए कुल 730 बोरी भुना चना जब्त कर लिया। जब्त किए गए चने की अनुमानित कीमत करीब 18 लाख रुपये बताई जा रही है। गोदाम को सील कर दिया गया है, ताकि कोई भी सामग्री बाहर न जा सके। अधिकारियों के मुताबिक यह पूरा स्टॉक बाजार में खपाने की तैयारी में था। यदि यह चना दुकानों और ठेलों तक पहुंच जाता, तो बड़ी संख्या में लोग इसके सेवन से गंभीर बीमारियों की चपेट में आ सकते थे। यही वजह है कि Food Adulteration in Gorakhpur को जनस्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा माना जा रहा है।

जांच में यह भी सामने आया है,कि मिलावटी चने की यह खेप मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से मंगवाई गई थी। हैरानी की बात यह है, कि कागजों में सब कुछ सही दिखाया गया। चना जीएसटी बिल के साथ खरीदा गया था, लेकिन रंग और चमक बढ़ाने के लिए उसमें ऑरामाइन जैसे खतरनाक केमिकल का इस्तेमाल किया गया। अब खाद्य सुरक्षा विभाग इस पूरे अंतरराज्यीय नेटवर्क की गहन जांच में जुट गया है। यह पता लगाया जा रहा है, कि सप्लाई चेन में और कौन कौन लोग शामिल हैं, और किन किन बाजारों में इस चने की सप्लाई होनी थी। साफ है कि Food Adulteration in Gorakhpur सिर्फ एक गोदाम तक सीमित मामला नहीं है।

इस पूरे मामले पर सहायक आयुक्त खाद्य सुरक्षा डॉ. सुधीर कुमार सिंह ने बताया कि मौके से विधिक नमूने लेकर प्रयोगशाला भेज दिए गए हैं। रिपोर्ट आने के बाद खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 की सुसंगत धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया जाएगा। विशेष रूप से धारा 59, जो असुरक्षित भोजन से जुड़ी है, उसके अंतर्गत कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि विभाग मिलावटखोरों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम कर रहा है,और भविष्य में भी ऐसी कार्रवाई लगातार जारी रहेगी। प्रशासन का मानना है,कि सख्ती से ही Food Adulteration in Gorakhpur पर अंकुश लगाया जा सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी इस मामले को बेहद गंभीर बता रहे हैं। बीआरडी मेडिकल कॉलेज के फिजिशियन डॉ. राजकिशोर सिंह के अनुसार ऑरामाइन एक अत्यंत खतरनाक और विषैला रसायन है। इसके सेवन से कैंसर होने की आशंका कई गुना बढ़ जाती है, खासकर लीवर और मूत्राशय के कैंसर का खतरा रहता है। लंबे समय तक इसका सेवन लीवर, किडनी और पेट को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। आंखों में जलन, त्वचा रोग और सांस से जुड़ी समस्याएं भी हो सकती हैं। बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह और भी ज्यादा घातक साबित होता है। यही वजह है, कि Food Adulteration in Gorakhpur को डॉक्टर और प्रशासन दोनों ही बड़े अलर्ट के तौर पर देख रहे हैं।

यह कार्रवाई एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है,कि खाने पीने की चीजों में मिलावट अब कितना बड़ा खतरा बन चुकी है। जरूरत इस बात की है, कि लोग भी जागरूक रहें, सस्ते और ज्यादा चमकदार दिखने वाले खाद्य पदार्थों से सावधान रहें और किसी भी संदिग्ध चीज की जानकारी तुरंत प्रशासन को दें। क्योंकि Food Adulteration in Gorakhpur के खिलाफ लड़ाई सिर्फ सरकारी विभागों की नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

Disclaimer यह समाचार प्रशासनिक अधिकारियों के बयान, प्रारंभिक जांच रिपोर्ट और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय पर आधारित है। प्रयोगशाला रिपोर्ट और कानूनी कार्रवाई के बाद तथ्यों में बदलाव संभव है।

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