Gulfisha Fatima Bail गुलफिशा फ़ातिमा की रिहाई के बाद बड़ा सवाल: बिना दोष सिद्ध हुए 5 साल जेल में कैसे रहीं आरोपी
Gulfisha Fatima Bail दिल्ली दंगों के मामले में गुलफिशा फ़ातिमा को सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिली। पांच साल की लंबी कैद, पेरोल से वंचित रहना और न्यायिक प्रक्रिया की देरी पर गंभीर सवाल।
दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में जेल में बंद रहीं गुलफिशा फ़ातिमा आखिरकार सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिलने के बाद जेल से बाहर आ गई हैं। उनकी रिहाई के साथ ही भारतीय न्याय व्यवस्था पर एक गहरा और असहज सवाल खड़ा हो गया है,अगर दोष सिद्ध नहीं हुआ था, तो कोई व्यक्ति पांच साल से अधिक समय तक जेल में कैसे रह सकता है?
यह मामला अब केवल Gulfisha Fatima Bail तक सीमित नहीं रहा, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया पर राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया है।
सुप्रीम कोर्ट की ज़मानत और उसके मायने
दो दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों से जुड़े कुछ मामलों में ज़मानत देते हुए लंबी न्यायिक हिरासत और मुकदमे में असामान्य देरी को महत्वपूर्ण आधार माना। गुलफिशा फ़ातिमा उन्हीं आरोपियों में शामिल थीं।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, Gulfisha Fatima Bail इस बात का संकेत है,कि अदालत ने यह माना कि वर्षों तक ट्रायल शुरू न होना व्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।
पांच साल की जेल, न पेरोल न राहत
गुलफिशा फ़ातिमा पांच साल से अधिक समय तक जेल में रहीं। इस पूरी अवधि में उन्हें एक बार भी पेरोल नहीं दी गई।
न तो उनके खिलाफ दोष सिद्ध हुआ, न ही ट्रायल किसी निर्णायक चरण में पहुंच सका। इसके बावजूद उनकी आज़ादी वर्षों तक सीमित रही।
यही वजह है कि Gulfisha Fatima Bail के बाद यह सवाल और तेज हो गया है, कि क्या लंबी विचाराधीन कैद अपने आप में सज़ा बन चुकी है?
क्या ‘अंडरट्रायल’ होना ही अपराध बन गया?
भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। लेकिन गुलफिशा फ़ातिमा जैसे मामलों में यह अधिकार कागजों तक सीमित नजर आता है।
कई मानवाधिकार संगठनों का कहना है, कि वर्षों तक बिना फैसला आए जेल में रखना न्यायिक सिद्धांतों के खिलाफ है।
Gulfisha Fatima Bail ने इस व्यवस्था पर एक बार फिर रोशनी डाल दी है।
कानून बनाम न्याय: कहां खिंच गई रेखा?
सरकारी पक्ष का कहना है,कि कार्रवाई कानून के तहत की गई। वहीं आलोचकों का तर्क है,कि कठोर धाराओं के कारण ज़मानत लगभग असंभव हो जाती है,और व्यक्ति सालों तक जेल में रहता है।
अदालत द्वारा अब ज़मानत दिए जाने के बाद यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि अगर ज़मानत दी जा सकती थी, तो यह फैसला पहले क्यों नहीं आया?
Gulfisha Fatima Bail इसी असहज सवाल की याद दिलाती है।
रिहाई के बाद देशभर में बहस
गुलफिशा फ़ातिमा की रिहाई के बाद सोशल मीडिया, कानूनी हलकों और नागरिक समाज में बहस तेज हो गई है।
कुछ लोग इसे देर से मिला न्याय बता रहे हैं, तो कुछ इसे भारतीय न्यायिक प्रणाली की संरचनात्मक कमजोरी का उदाहरण मान रहे हैं।
स्पष्ट है, कि Gulfisha Fatima Bail अब सिर्फ एक व्यक्ति की रिहाई नहीं, बल्कि एक प्रणालीगत बहस बन चुकी है।
दिल्ली दंगे और लंबी न्यायिक प्रक्रिया
दिल्ली दंगों से जुड़े कई मामलों में आरोपी वर्षों से जेल में हैं, जबकि मुकदमे अब भी प्रारंभिक चरण में हैं।
कानून विशेषज्ञों का मानना है,कि अगर Gulfisha Fatima Bail जैसे फैसले पहले आते, तो शायद कई लोगों को वर्षों की कैद से बचाया जा सकता था।
निष्कर्ष
गुलफिशा फ़ातिमा की रिहाई भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने एक आईना है। यह मामला यह सोचने को मजबूर करता है कि न्याय केवल फैसला सुनाने का नाम नहीं, बल्कि समय पर न्याय देने की जिम्मेदारी भी है।
Gulfisha Fatima Bail आने Each समय में अंडरट्रायल कैदियों और लंबी सुनवाई पर नीति स्तर की बहस को नई दिशा दे सकता है।
डिस्क्लेमर यह लेख न्यायालय के आदेशों, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तथ्यों और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। किसी भी आरोपी को दोषी या निर्दोष ठहराने का अधिकार केवल न्यायालय को है। लेख का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े प्रश्नों को तथ्यात्मक और जनहित के दृष्टिकोण से प्रस्तुत करना है, न कि किसी निष्कर्ष पर पहुँचना।