Minor Crime Parents Arrest: बदायूं में नाबालिग़ों के आरोप पर मां बाप की गिरफ्तारी

Written by: akhtar husain

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Minor Crime Parents Arrest नाबालिग़ों पर आरोप, जेल पहुंचे मां बाप बदायूं के तीन मामलों ने खड़ा किया बड़ा सवाल

UP के बदायूं में Minor Crime Parents Arrest के तीन मामलों ने कानून और पुलिस कार्रवाई पर सवाल खड़े किए। आरोप नाबालिग़ों पर, जेल भेजे गए माता पिता, SHO लाइन हाज़िर, रिपोट तलब।

कभी कभी कोई खबर सिर्फ़ घटना नहीं रहती वह सिस्टम की सोच को सामने रख देती है, बदायूं में सामने आए तीन मामलों ने ऐसा ही किया है, आरोप नाबालिग़ों पर लगे, लेकिन पुलिस कार्रवाई उनके माता पिता तक पहुंच गई। Minor Crime Parents Arrest का यह सिलसिला न केवल चर्चा में है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है।

Minor Crime Parents Arrest: बदायूं में नाबालिग़ों के आरोप पर मां बाप की गिरफ्तारी
Minor Crime Parents Arrest: बदायूं में नाबालिग़ों के आरोप पर मां बाप की गिरफ्तारी

कि क्या पुलिस कानून के मुताबिक़ चली या फिर “संदेश देने” के नाम पर अपनी सीमाओं से आगे बढ़ गई। आम लोगों के मन में असमंजस है, कि अगर आरोपी बच्चा है, तो सज़ा या गिरफ़्तारी उसके मां बाप की क्यों?

पूरा मामला बदायूं के उसैहत थाना क्षेत्र से जुड़ा है, 17 दिसंबर को कक्षा आठ की एक छात्रा के पिता ने शिकायत दर्ज कराई कि गांव के चार नाबालिग़ लड़कों ने उसकी बेटी से छेड़छाड़ की और अश्लील टिप्पणियां कीं। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 296 और 78 के साथ पॉक्सो एक्ट की धारा 7/8 के तहत मुक़दमा दर्ज किया।

आरोपी बच्चे 13 साल से कम उम्र के थे, इसलिए उन्हें हिरासत में नहीं लिया गया। लेकिन इसके बजाय पुलिस ने उनके परिवारों को नोटिस जारी किए और बाद में चारों लड़कों की माताओं को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 170 के तहत निवारक कार्रवाई में गिरफ़्तार कर लिया। यही कदम Minor Crime Parents Arrest विवाद की जड़ बना।

इन महिलाओं को उपजिलाधिकारी की अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें निजी मुचलके पर उसी दिन ज़मानत मिल गई। मामला तब और गरमा गया, जब तत्कालीन एसएचओ अजय पाल सिंह ने मीडिया से कहा कि बच्चों को “अच्छे संस्कार” नहीं दिए गए, इसलिए माता पिता पर कार्रवाई की गई ताकि समाज में संदेश जाए।

यह बयान सोशल मीडिया से लेकर कानूनी हलकों तक में आलोचना का कारण बना। सवाल उठा कि “अच्छे संस्कार” तय करने का अधिकार पुलिस को किस कानून ने दिया है और क्या Minor Crime Parents Arrest जैसी कार्रवाई कानूनी कसौटी पर टिकती है?

यह पहला मामला नहीं था। 22 नवंबर को उसी क्षेत्र के एक स्कूल में कक्षा सात आठ की छात्राओं की पानी की बोतलों में कथित तौर पर पेशाब भरने और दीवारों पर अश्लील शब्द लिखने की घटना सामने आई थी। आरोप चार नाबालिग़ लड़कों पर लगे और मुक़दमा भी उन्हीं के खिलाफ दर्ज हुआ, लेकिन पुलिस ने उन लड़कों के पिताओं को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया।

इसके बाद 12 दिसंबर को प्रधानमंत्री की तस्वीर से छेड़छाड़ और उस पर अभद्र टिप्पणी लिखने का आरोप एक नाबालिग़ छात्रा पर लगा, लेकिन पुलिस ने छात्रा की जगह उसके भाई को जेल भेज दिया। इन तीनों घटनाओं में एक ही पैटर्न दिखा, जिसने Minor Crime Parents Arrest को गंभीर बहस का विषय बना दिया।

विवाद बढ़ने पर पुलिस प्रशासन को भी कदम उठाना पड़ा। बदायूं के एसएसपी बृजेश सिंह के पीआरओ अश्विनी कुमार के मुताबिक़, उसैहत थाने के तत्कालीन प्रभारी अजय पाल सिंह को जांच और शिकायतों में लापरवाही के आरोप में लाइन हाज़िर कर दिया गया है। यह कार्रवाई मुरादाबाद के डीआईजी अजय साहनी की समीक्षा बैठक के बाद की गई।

साथ ही पुलिस मुख्यालय स्तर से पूरे प्रकरण की रिपोर्ट तलब की गई है। हालांकि अब तक इस सवाल पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया है,कि बच्चों की जगह उनके माता पिता को गिरफ़्तार करने का फैसला किस आधार पर लिया गया।

Minor Crime Parents Arrest कानूनी विशेषज्ञों का कहना है, कि इन मामलों में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट और पॉक्सो कानून के प्रावधानों का सही ढंग से पालन नहीं हुआ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की वकील सायमा ख़ान के अनुसार, भारतीय कानून में माता पिता पर किसी और के अपराध की सामूहिक जिम्मेदारी थोपने की कोई सामान्य अवधारणा नहीं है।

पॉक्सो या भारतीय न्याय संहिता में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो नाबालिग़ द्वारा किए गए कथित अपराध के लिए उसकी मां या पिता को अभियुक्त या हिरासत में लेने की अनुमति देता हो।

उनके मुताबिक़, बिना प्रत्यक्ष सहभागिता या उकसावे के Minor Crime Parents Arrest निवारक शक्तियों का दुरुपयोग और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन माना जा सकता है।

Minor Crime Parents Arrest मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया। समाजवादी पार्टी सहित विपक्षी दलों ने पुलिस और राज्य सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि नाबालिग़ों से जुड़े संवेदनशील मामलों में पुलिस ने न तो कानून की सही समझ दिखाई और न ही

मानवीय दृष्टिकोण अपनाया। बदायूं के सपा ज़िलाध्यक्ष आशीष यादव ने कहा कि सिर्फ़ एसएचओ को हटाने से जवाबदेही तय नहीं होती, जब आला अधिकारियों को भी पूरे घटनाक्रम की जानकारी थी।

वहीं बीजेपी के ज़िलाध्यक्ष राजीव गुप्ता का कहना है,कि कानून व्यवस्था से कोई समझौता नहीं होगा और बहन बेटियों की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वाला कोई भी हो, बचेगा नहीं।

कुल मिलाकर बदायूं के ये तीनों मामले यह सवाल छोड़ जाते हैं कि Minor Crime Parents Arrest जैसी कार्रवाई क्या सच में अपराध रोकने का रास्ता है या फिर यह कानून की भावना से भटकाव है।

जानकार मानते हैं कि नाबालिग़ों से जुड़े मामलों में दंड के साथ-साथ परामर्श और सुधारात्मक उपाय भी उतने ही ज़रूरी हैं, ताकि कानून का उद्देश्य सज़ा नहीं, बल्कि सुधार बन सके।

Disclaimer यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सूचनाओं, कानूनी प्रावधानों और संबंधित अधिकारियों के बयानों पर आधारित है। किसी भी मामले में अंतिम निर्णय न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में होता है। लेख का उद्देश्य सूचना देना और जनहित में चर्चा को बढ़ावा देना है।

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