Shankaracharya controversy अविमुक्तेश्वरानंद एपिसोड: जब सत्ता धर्म पर भारी पड़ी और संघ-बीजेपी एक ‘अदृश्य पीठ’ के रूप में उभर आई
Shankaracharya controversy माघ मेले में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को स्नान से रोके जाने का मामला क्यों बना बड़ा राजनीतिक-धार्मिक विवाद, योगी सरकार, संघ और प्रशासन की भूमिका पर उठते सवाल।
प्रयागराज माघ मेले में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को पालकी में बैठकर संगम स्नान से रोके जाने की घटना अब महज़ प्रशासनिक निर्णय नहीं रह गई है। यह प्रकरण Shankaracharya controversy के रूप में उस टकराव का प्रतीक बन चुका है, जहां सत्ता, संगठन और संत परंपरा आमने-सामने खड़ी दिखाई दे रही है। पांचवें दिन भी धरना जारी है, तबीयत बिगड़ रही है, लेकिन शासन का रुख नरम नहीं हुआ।
18 जनवरी, मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य को स्नान से रोका गया। पुलिस और समर्थकों के बीच धक्का-मुक्की हुई और उसके बाद धरना शुरू हुआ। सवाल यह नहीं है कि स्नान किस नियम से होगा, सवाल यह है कि क्या किसी शंकराचार्य से उसका शंकराचार्य होने का प्रमाण मांगना लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था में स्वीकार्य है? यही प्रश्न Shankaracharya controversy की आत्मा है।
प्रशासन ने नोटिस जारी किए, जवाब भी आ गया। आठ पन्नों के जवाब में साफ कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश उन पर लागू नहीं होता क्योंकि पट्टाभिषेक पहले हो चुका था। इसके बावजूद टकराव जारी रहा। इससे यह संदेश गया कि मामला नियमों से ज्यादा सत्ता के प्रभुत्व का है। यही वजह है कि Shankaracharya controversy अब आस्था बनाम प्रशासन नहीं, बल्कि धर्म की स्वायत्तता बनाम सत्ता के हस्तक्षेप का मुद्दा बन गई है।
इस पूरे घटनाक्रम में संत समाज भी एकजुट नहीं दिखा। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और जगद्गुरु रामभद्राचार्य आमने-सामने आए। संतों की यह आपसी खींचतान सत्ता के लिए अवसर बन गई। जब धर्म अंदर से कमजोर दिखे, तो सत्ता बाहर से हावी हो जाती है, और यही Shankaracharya controversy में साफ नजर आता है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ‘कालनेमि’ वाला बयान इस विवाद का निर्णायक मोड़ बना। एक संत को परोक्ष रूप से असुर प्रवृत्ति से जोड़ना, यह संकेत देता है कि अब धर्म की वैधता का प्रमाणपत्र भी सत्ता तय करेगी। इसके जवाब में अविमुक्तेश्वरानंद का सवाल सीधा था “मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री रहें, धर्माचार्य न बनें।” यही टकराव Shankaracharya controversy को पूरी तरह राजनीतिक रंग देता है।
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की सहानुभूति ने इस आग को और भड़का दिया। राजनीति में यह संदेश गया कि अविमुक्तेश्वरानंद एक खेमे के साथ खड़े हैं। इसके बाद संघ और सरकार का रुख और सख्त हुआ। संघ के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार के बयान, बिना नाम लिए, सरकार के स्टैंड का समर्थन करते दिखे। साफ संकेत था व्यवस्था के खिलाफ खड़ा होना अब स्वीकार्य नहीं। यही वजह है कि Shankaracharya controversy में शंकराचार्य खुद को अलग-थलग महसूस कर रहे हैं।
अविमुक्तेश्वरानंद का सबसे तीखा हमला तब सामने आया जब उन्होंने कहा कि सत्ता में बैठे “काले अंग्रेज” खुद को हिंदूवादी कहते हैं, लेकिन गौ-हत्या और साधुओं के अपमान पर चुप रहते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि योगी स्वयं साधु हैं, लेकिन उनकी पुलिस साधुओं की शिखा पकड़कर अपमान कर रही है। यह बयान सीधे-सीधे सरकार की कथित हिंदुत्व नीति की पोल खोलता है और Shankaracharya controversy को वैचारिक संघर्ष बना देता है।
आदि शंकराचार्य ने पीठों की स्थापना सत्ता से स्वतंत्र रहकर धर्म की रक्षा के लिए की थी। आज वही परंपरा सत्ता से जवाब मांग रही है। विडंबना यह है कि संघ-बीजेपी एक ऐसी अनौपचारिक पीठ की तरह उभर आई है, जो तय कर रही है कि कौन संत स्वीकार्य है और कौन नहीं। यही इस पूरे प्रकरण की सबसे बड़ी सच्चाई है, और यही कारण है कि Shankaracharya controversy केवल एक संत का धरना नहीं, बल्कि धर्म और लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा सवाल बन चुकी है।
यह लेख सार्वजनिक बयानों, घटनाक्रम और उपलब्ध सूचनाओं पर आधारित विश्लेषण है। इसका उद्देश्य किसी धर्म, व्यक्ति या संस्था की भावनाओं को आहत करना नहीं, बल्कि जनहित में विषय को तथ्यात्मक रूप से प्रस्तुत करना है।
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