Unnao Rape Case उन्नाव रेप केस में कुलदीप सेंगर को हाईकोर्ट से जमानत, लेकिन जेल से रिहाई नहीं

Written by: akhtar husain

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Unnao Rape Case उन्नाव रेप केस हाईकोर्ट की राहत, लेकिन कुलदीप सेंगर के लिए जेल के दरवाजे अब भी बंद

 Unnao Rape Case में दिल्ली हाईकोर्ट ने पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को सशर्त जमानत दी, पिता की हत्या मामले में सजा के कारण जेल से बाहर नहीं आएंगे

कभी कभी अदालत का फैसला राहत भी देता है, और सख्त संदेश भी। उन्नाव से जुड़ा बहुचर्चित मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। वर्षों से जेल में बंद पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को दिल्ली हाईकोर्ट से जमानत मिली है, लेकिन यह खबर जितनी बड़ी दिखती है, उतनी ही सीमित भी है। वजह साफ है, जमानत के बावजूद कुलदीप सेंगर जेल से बाहर नहीं आ पाएंगे। Unnao Rape Case में आया यह फैसला कानून की जटिलताओं और न्याय की लंबी प्रक्रिया को एक बार फिर सामने लाता है।

Unnao Rape Case उन्नाव रेप केस में कुलदीप सेंगर को हाईकोर्ट से जमानत, लेकिन जेल से रिहाई नहीं
Unnao Rape Case उन्नाव रेप केस में कुलदीप सेंगर को हाईकोर्ट से जमानत, लेकिन जेल से रिहाई नहीं

Unnao Rape Case में निचली अदालत द्वारा आजीवन कारावास की सजा काट रहे कुलदीप सिंह सेंगर ने अपनी दोषसिद्धि को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। इसी अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने उन्हें सशर्त जमानत देने का आदेश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह जमानत अपील पर अंतिम फैसले तक ही प्रभावी रहेगी। यानी यह कोई स्थायी राहत नहीं है, बल्कि कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि जमानत का मतलब आरोपों से मुक्त होना नहीं है।

हालांकि Unnao Rape Case में जमानत मिलने के बावजूद सेंगर की रिहाई इसलिए नहीं होगी, क्योंकि वह पीड़िता के पिता की हत्या के मामले में भी दोषी ठहराया जा चुका है। इस केस में उसे 10 साल की सजा सुनाई गई थी, जो अभी पूरी नहीं हुई है। कानून के मुताबिक, जब तक किसी अन्य मामले में सजा चल रही हो, तब तक आरोपी जेल से बाहर नहीं आ सकता। इसी कारण सेंगर फिलहाल जेल में ही रहेगा।

दिल्ली हाईकोर्ट ने जमानत देते समय कई सख्त शर्तें लगाई हैं। अदालत ने 15 लाख रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के दो जमानती पेश करने का आदेश दिया है। साथ ही यह भी निर्देश दिया गया है,कि कुलदीप सेंगर जमानत अवधि के दौरान दिल्ली में ही रहेगा और बिना अनुमति कहीं बाहर नहीं जाएगा। Unnao Rape Case की संवेदनशीलता को देखते हुए कोर्ट ने साफ कहा कि सेंगर पीड़िता के पांच किलोमीटर के दायरे में भी प्रवेश नहीं करेगा।

अदालत ने यह भी आदेश दिया है,कि कुलदीप सेंगर हर सोमवार स्थानीय पुलिस थाने में हाजिरी लगाएगा। इसके अलावा वह पीड़िता या उसके परिवार से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संपर्क नहीं करेगा और न ही किसी तरह की धमकी देगा। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि जमानत की किसी भी शर्त का उल्लंघन होने पर उसे तुरंत रद्द कर दिया जाएगा। Unnao Rape Case में यह स्पष्ट संदेश है,कि अदालत किसी भी तरह की ढील देने के मूड में नहीं है।

हाईकोर्ट ने सेंगर को अपना पासपोर्ट निचली अदालत में जमा करने का भी निर्देश दिया है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि वह देश छोड़कर न जा सके। अदालत ने यह भी कहा कि जमानत के दौरान आरोपी की गतिविधियों पर प्रशासन और पुलिस की नजर बनी रहनी चाहिए। इस आदेश से साफ है,कि Unnao Rape Case में न्यायिक सतर्कता पूरी तरह बरकरार है।

यह मामला सिर्फ एक आपराधिक केस नहीं रहा। Unnao Rape Case ने देशभर में कानून व्यवस्था, राजनीतिक प्रभाव और पीड़ितों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे। निचली अदालत द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को उस समय एक मजबूत और ऐतिहासिक फैसला माना गया था। इसके बाद पीड़िता के पिता की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है,कि Unnao Rape Case में हाईकोर्ट का यह आदेश अपील प्रक्रिया के दौरान संतुलन बनाए रखने का उदाहरण है। एक तरफ अदालत ने आरोपी को कानूनी अधिकार के तहत जमानत दी, तो दूसरी ओर कड़ी शर्तें लगाकर पीड़िता की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। यह फैसला लंबे समय तक इसलिए याद रखा जाएगा, क्योंकि यह दिखाता है,कि न्याय व्यवस्था दबाव नहीं, बल्कि कानून के आधार पर चलती है।

आने वाले समय में Unnao Rape Case में हाईकोर्ट की अपील पर अंतिम फैसला बेहद अहम होगा। देश की नजरें इस बात पर टिकी रहेंगी कि अदालत इस संवेदनशील मामले में आगे क्या रुख अपनाती है। फिलहाल इतना तय है,कि जमानत के बावजूद कुलदीप सेंगर की जेल से रिहाई नहीं होगी और न्यायिक प्रक्रिया अपने तय रास्ते पर आगे बढ़ती रहेगी।

Disclaimer यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध समाचार रिपोर्टों और अदालती आदेशों पर आधारित है। मामला न्यायालय में विचाराधीन है। किसी भी आरोपी को दोषी या निर्दोष ठहराने का अधिकार केवल न्यायालय को है।

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akhtar husain

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