Yogi Adityanath cow love controversy गोरखनाथ मंदिर में योगी आदित्यनाथ ने दो गायों को गुड़ खिलाया, अखिलेश यादव बोले लाखों भूखी गायों का दर्द क्या ऐसे छिपेगा
Yogi Adityanath cow love controversy योगी की “गाय प्रेम” की तस्वीर बनाम ज़मीन की सच्चाई
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में गोरखनाथ मंदिर में दो गायों को गुड़ खिलाकर अपनी परंपरागत “गौसेवा” की रस्म निभाई।
Yogi Adityanath cow love controversy सोशल मीडिया पर यह तस्वीरें तेजी से वायरल हुईं।
लेकिन समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा
“दो गायों को गुड़ खिलाकर क्या योगीजी लाखों गायों की भूख और दर्द को छिपा सकते हैं?”
Yogi Adityanath cow love controversy लोगों के बीच यह चर्चा गर्म है,कि राज्य के कई गोशालाओं में गायें भूख, बीमारी और बदहाल हालात से गुजर रही हैं, जबकि सरकार सिर्फ दिखावे की तस्वीरों तक सीमित रह गई है।
अखिलेश यादव ने उठाया सवाल गायों के नाम पर राजनीति या सेवा
अखिलेश यादव ने कहा कि उत्तर प्रदेश में हजारों गोशालाएँ कागज़ों पर चल रही हैं। असली तस्वीर गांवों और सड़कों पर दिखती है, जहाँ भूखी प्यासी गायें कूड़े में खाना ढूंढती नजर आती हैं। उन्होंने ट्वीट कर लिखा, “योगीजी, मंदिर में गुड़ खिलाने से ज्यादा जरूरी है,कि आप उन गायों की सुध लें जो भूख से मर रही हैं।”
राज्य में कई बार ऐसी रिपोर्टें आई हैं जहाँ गोशालाओं में चारे और दवाई की भारी कमी बताई गई है। Yogi Adityanath cow love controversy विपक्ष का कहना है,कि गायों के नाम पर सरकार करोड़ों रुपये खर्च दिखाती है, लेकिन हकीकत जमीन पर कुछ और है।
सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीरों ने बढ़ाई बहस
गोरखनाथ मंदिर में योगी आदित्यनाथ की गायों को गुड़ खिलाने की तस्वीरें जैसे ही वायरल हुईं, ट्विटर (X) और फेसबुक पर लोगों ने इसे “राजनीतिक नाटक” बताया।
कई यूज़र्स ने लिखा, “जब कैमरे बंद हों, तब असली सेवा दिखती है।”
वहीं, बीजेपी समर्थक इसे “गौसेवा की परंपरा” बताते हुए बचाव कर रहे हैं। Yogi Adityanath cow love controversy यह बहस सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य में पशु कल्याण की गंभीर स्थिति पर भी ध्यान दिला रही है।
गोशालाओं की हालत पर सरकार की जिम्मेदारी
उत्तर प्रदेश में करीब 6,000 से अधिक गोशालाएँ संचालित हैं, लेकिन कई जिलों से खबरें आती हैं, कि उनमें न तो पर्याप्त चारा है, और न ही साफ सफाई की व्यवस्था। स्थानीय प्रशासन अक्सर बजट की कमी का हवाला देता है, जबकि ग्रामीण बताते हैं,कि भूखी गायें खेतों में घुसकर फसलें नुकसान पहुँचा रही हैं।
पशुपालन विभाग के अनुसार, राज्य सरकार ने “गौ कल्याण” पर करोड़ों रुपये खर्च किए हैं, लेकिन इन योजनाओं की पारदर्शिता पर सवाल उठते रहे हैं। यही कारण है, कि विपक्ष इसे “कागज़ी सेवा” कह रहा है।
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गाय हमारी संस्कृति का प्रतीक, राजनीति का औजार नहीं
भारत में गाय सिर्फ पशु नहीं, आस्था और संस्कृति का प्रतीक है। लेकिन दुख की बात यह है, कि इसे राजनीतिक भाषणों और फोटोशूट्स तक सीमित कर दिया गया है। जरूरत इस बात की है, कि सरकारें दिखावे की जगह असल सेवा करें, भूखी गायों के लिए चारा, स्वच्छ गोशालाएँ और चिकित्सा व्यवस्था सुनिश्चित करें। तभी “गौसेवा” शब्द का असली अर्थ सार्थक होगा।
डिस्क्लेमर
यह लेख सार्वजनिक बयानों, मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया प्रतिक्रियाओं पर आधारित है। हम किसी भी राजनीतिक पक्ष का समर्थन या विरोध नहीं करते। इस लेख का उद्देश्य केवल सामाजिक और मानवीय दृष्टिकोण से सच्चाई को उजागर करना है। अंतिम सत्य की पुष्टि संबंधित प्रशासनिक जांच के बाद ही हो सकेगी।