Zero Tolerance Policy जब मंत्री खुद लाचार हो जाएं अमरोहा से उठा सवाल क्या उत्तर प्रदेश में ज़ीरो टॉलरेंस सिर्फ़ भाषणों तक सिमट गई है,
Zero Tolerance Policy अमरोहा में रिश्वत मांगने का मामला मंत्री तक पहुंचा, विभागीय भ्रष्टाचार उजागर, क्या यूपी में ज़ीरो टॉलरेंस नीति सिर्फ कागज़ों में है
उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री अरविंद कुमार शर्मा का एक वीडियो सामने आने के बाद सत्ता और सिस्टम दोनों कटघरे में खड़े नजर आ रहे हैं। अमरोहा जिले से जुड़ा यह मामला केवल एक रिश्वत की शिकायत नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की पोल खोलता है, जो ऊपर से ईमानदारी का दावा करती है और नीचे खुलेआम वसूली चल रही है। मंत्री का अपने ही विभाग के वरिष्ठ अधिकारी को फोन कर बेबसी जताना इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि Zero Tolerance Policy ज़मीनी हकीकत से कितनी दूर जा चुकी है।
मंत्री जी के अनुसार, पहले एक संविदा कर्मी ने खुले तौर पर पैसे की मांग की। जब पीड़ित व्यक्ति कनेक्शन के लिए XCN के पास पहुंचा, तो जवाब और भी चौंकाने वाला था—“25 लाख रुपये देकर पोस्टिंग कराई है, अगर वसूली नहीं करूंगा तो कैसे काम चलेगा।” यह बयान सिर्फ एक अधिकारी की मानसिकता नहीं दिखाता, बल्कि उस पूरे सिस्टम को बेनकाब करता है, जहां Zero Tolerance Policy सिर्फ फाइलों में सुरक्षित है।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब एक मंत्री को खुद हस्तक्षेप करना पड़ रहा है, तो आम नागरिक की सुनवाई आखिर किस दरवाजे पर होती है? यह घटना साबित करती है कि Zero Tolerance Policy का डर भ्रष्ट तंत्र में लगभग खत्म हो चुका है। रिश्वत अब छुपकर नहीं, बल्कि तर्क के साथ मांगी जा रही है।
यह राहत की बात जरूर है कि इस मामले में पीड़ित व्यक्ति मंत्री तक पहुंच सका। लेकिन यह भी एक डरावनी सच्चाई है कि रोज़ न जाने कितने लोग सिस्टम से लड़ते-लड़ते थक जाते होंगे और मजबूरी में घूस दे रहे होंगे। यही वह कड़वा सच है जो Zero Tolerance Policy के सरकारी दावों को खोखला साबित करता है।
मंत्री अरविंद कुमार शर्मा की नाराजगी और उच्च अधिकारी को किया गया फोन यह दिखाता है कि सरकार के भीतर भी कुछ लोग व्यवस्था सुधारना चाहते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल फोन कॉल से वह तंत्र सुधर जाएगा, जहां पोस्टिंग से लेकर ट्रांसफर तक वसूली का नेटवर्क बना हो? जब तक इस जड़ पर प्रहार नहीं होगा, तब तक Zero Tolerance Policy सिर्फ एक नारा बनी रहेगी।
अमरोहा का यह मामला पूरे प्रदेश के लिए चेतावनी है। यदि भ्रष्टाचार उजागर होने के बाद भी जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई नहीं होती, तो जनता का भरोसा पूरी तरह टूट जाएगा। तब यह मानना पड़ेगा कि Zero Tolerance Policy का इस्तेमाल केवल चुनावी मंचों और सरकारी विज्ञापनों तक सीमित है।
अब वक्त आ गया है कि इस प्रकरण को मिसाल बनाकर ठोस कार्रवाई की जाए। दोषी संविदा कर्मी, अधिकारी और पोस्टिंग के खेल में शामिल लोगों पर कठोर कदम उठें, ताकि यह साबित हो सके कि Zero Tolerance Policy सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि शासन की वास्तविक नीति है।
यह लेख सार्वजनिक रूप से सामने आए वीडियो, बयानों और उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर लिखा गया है। लेख का उद्देश्य जनहित में मुद्दे को सामने रखना है। आरोपों की अंतिम पुष्टि संबंधित जांच एजेंसियों और विभागीय कार्रवाई पर निर्भर करती है।