झूठे मुकदमों की चीत्कार संसद में गूंजी: रवि किशन ने मांगा कड़ा ‘False Case Law’, बेगुनाहों को मिले इंसाफ
False Case Law की मांग संसद में तेज, रवि किशन ने कहा झूठे मुकदमे करने वालों और गलत जांच करने वाले अधिकारियों पर तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए। बेगुनाहों की पीड़ा और विशेषज्ञों की सलाह का पूरा विश्लेषण।
भारत की न्याय व्यवस्था में एक बड़ी खामोशी पीड़ा बनकर जमी हुई है,झूठे मुकदमे। किसी निर्दोष व्यक्ति पर लगने वाला झूठा आरोप सिर्फ एक केस नहीं होता, बल्कि उसके पूरे परिवार को तोड़ने वाला तूफान होता है। इसी लंबे दर्द को आवाज देते हुए गोरखपुर के भाजपा सांसद रवि किशन ने संसद में जोरदार तरीके से मांग रखी कि अब समय आ गया है,जब देश में False Case Law जैसा सख्त कानून बने, ताकि झूठे मामले दर्ज कराने वालों को तुरंत सजा मिल सके और बेगुनाह लोगों का जीवन बर्बाद होने से बच सके।
रवि किशन ने कहा कि कई बार लोग निजी दुश्मनी, बदले की भावना, रिश्ता टूटने या किसी छोटे विवाद को बड़ा दिखाने के लिए झूठे मामले दर्ज करा देते हैं। लेकिन इन झूठे मामलों का परिणाम उस व्यक्ति को झेलना पड़ता है,जिसने कोई अपराध नहीं किया होता। उसका परिवार बिखर जाता है, समाज में उसकी प्रतिष्ठा खत्म हो जाती है, नौकरी खतरे में पड़ जाती है, और बहन बेटियों के रिश्ते टूट जाते हैं। उन्होंने कहा कि झूठा केस करने वाला आराम से जीवन जीता है, लेकिन निर्दोष व्यक्ति कोर्ट कचहरी के चक्कर काटते काटते टूट जाता है। इसलिए अब एक ऐसा False Case Law जरूरी है,जो शिकायतकर्ता और गलत जांच करने वाले अधिकारियों पर भी सख्त कार्रवाई करे।
उन्होंने संसद में स्पष्ट कहा कि जब कोई निर्दोष व्यक्ति कोर्ट से बरी हो जाता है, तो उसी फैसले में यह भी तय किया जाए कि जिस व्यक्ति ने False Case Law को दुरुपयोग करते हुए झूठा आरोप लगाया था, उसे भी सजा और आर्थिक दंड मिले। साथ ही, यदि किसी जांच अधिकारी (Investigation Officer) ने बिना सही जांच किए आरोपों को सही ठहराया, तो उस अधिकारी पर भी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि आज भी कई मामले सिर्फ इसलिए लंबित रहते हैं क्योंकि जांच अधिकारी ने ध्यान से जांच नहीं की होती।
इस मुद्दे को और गहराई से समझने के लिए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी दुबे ने बताया कि बीएनएस (भारत न्याय संहिता) की धारा 248 झूठे मामलों के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति तो देती है, लेकिन यह नए केस से शुरू होती है। यानी जो व्यक्ति पहले ही सालों कोर्ट में लड़ चुका है, उसे फिर से नया मुकदमा शुरू करना पड़ता है। यह प्रक्रिया मानसिक और आर्थिक दोनों तरह से उसे और थका देती है। अश्विनी दुबे ने कहा कि झूठे मामलों में असल समस्या यह है, कि शिकायतकर्ता पर तुरंत कोई कानूनी दबाव नहीं आता। इसलिए एक सख्त False Case Law होना चाहिए जिसमें कोर्ट जब आरोप झूठा पाए, तो उसी दिन गलत शिकायतकर्ता और गलत जांच करने वाले अधिकारी दोनों को सजा और जुर्माना मिले। इससे लोगों में डर पैदा होगा और झूठे मामलों में भारी कमी आएगी।
उन्होंने बताया कि भारत में सबसे ज्यादा झूठे मामले रेप, यौन उत्पीड़न, शादी का झूठा वादा, छेड़छाड़, एससी एसटी एक्ट और घरेलू हिंसा जैसी धाराओं में दर्ज होते हैं। कई बार प्रेम संबंध आपसी सहमति से होते हैं, लेकिन रिश्ता बिगड़ने पर False Case Law का दुरुपयोग कर आरोप लगा दिया जाता है। बाद में पता चलता है, कि संबंध सहमति से था। उसी तरह कई जातिगत मामलों में भी कानून का गलत उपयोग देखने को मिलता है। लेकिन निर्दोष व्यक्ति तब तक सामाजिक, मानसिक और आर्थिक रूप से टूट चुका होता है।
विशेषज्ञों का मानना है,कि अगर भारत में एक मजबूत False Case Law लागू हो जाता है, तो स्थिति काफी बदल सकती है। अदालतों का बोझ घटेगा, पुलिस अधिक जिम्मेदारी से जांच करेगी, निर्दोष लोगों की प्रतिष्ठा बचेगी और असली अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई तेज होगी। इससे न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता और भी मजबूत होगी और लोगों का विश्वास कानून में बना रहे
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल जानकारी, विशेषज्ञों की राय और सांसद द्वारा उठाए गए मुद्दों पर आधारित है। इसका उद्देश्य न्याय प्रणाली सुधार और कानून के दुरुपयोग को रोकने पर जागरूकता बढ़ाना है। किसी व्यक्ति, संस्था या कानून को बदनाम करने का उद्देश्य नहीं है। पाठक किसी भी कानूनी कार्रवाई से पहले अधिकृत कानूनी सलाह अवश्य लें।
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