Kavya Utsav 2025शब्दों की खुशबू से महकी शाम: अभिव्यक्ति की काव्य-विचार गोष्ठी में रचनात्मकता का अभिनव उत्सव”

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Kavya Utsav 2025शब्दों की खुशबू से महकी शाम: अभिव्यक्ति की काव्य-विचार गोष्ठी में रचनात्मकता का अभिनव उत्सव”

गोरखपुर।

Kavya Utsav 2025  साहित्य वह रश्मि है, जो मन के अंधकार को विचारों के उजाले में रूपांतरित करती है। ऐसी ही एक सशक्त और सौम्य साहित्यिक संध्या का साक्षी बना गोरखपुर का साहित्यप्रेमी जनमानस, जब “अभिव्यक्ति” संस्था द्वारा आयोजित काव्य-विचार गोष्ठी में कवियों, लेखकों और साहित्यकारों का मनमोहक संगम हुआ।

इस सांस्कृतिक समागम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि और विचारक आचार्य प्रो. अनंत मिश्र ने की, जिन्होंने अपनी उद्बोधन में कहा –

Kavya Utsav 2025  चौरासी लाख योनियों के चक्र से गुजरने के बाद प्राप्त मानव जीवन यदि सृजन का माध्यम बने, तो वह आत्मा निश्चय ही धन्य है। कविता, भावनाओं की निर्विकार भाषा है, जो आत्मा को लोक के अनुभवों से जोड़ती है।”

गोष्ठी में विशिष्ट अतिथि के रूप में सम्मिलित हुए प्रसिद्ध समकालीन आलोचक श्रीधर मिश्र, जबकि कार्यक्रम की सुरुचिपूर्ण संयोजन-शैली ने कवि धर्मेन्द्र त्रिपाठी को विशेष रूप से रेखांकित किया।

Kavya Utsav 2025  वाणी-वन्दना से शुरू हुई रचनात्मक यात्रा

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Kavya Utsav 2025कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ युवा कवि रोहन मिश्र निष्पक्ष की मधुर वाणी वंदना से, जिसने उपस्थित श्रोताओं को भावनाओं की भूमि पर सहजता से उतार दिया।

“मन रोता है, किंतु अधर ये हँसते हैं,

ये अभिनय बिन सीखे सब ही करते हैं।”

इन पंक्तियों ने जीवन की कठोर सच्चाइयों पर एक कोमल लेकिन तीव्र व्यंग्य किया।

 नारी चेतना, समकालीनता और कोमलता का समागम

वासू वर्मा की कविता ने नारी सशक्तिकरण की आवाज को मुखर किया

“ग़ैर मुमकिन को मुमकिन ये कर जाएंगी,

एक अवसर तो दो बेटियों को ज़रा।”

नेहा मिश्रा ने अपनी ग़ज़ल में जीवन की तपिश को शब्दों में ढाला –

“ख़्वाहिशों की तपन से जली जा रही,

हो गई जेठ की दोपहर ज़िन्दगी।”

वहीं सौम्या द्विवेदी की कोमल कल्पनाएं स्त्री मन की नाजुक परतों को छूती नज़र आईं –

“एक लड़की / महसूसती है जीवंतता /

फूल-पत्ती, तितली की तरह जीना चाहती है।”

  Kavya Utsav 2025उर्दू की मिठास और व्यंग्य की धार

नित्या त्रिपाठी की शायरी में विरह और इंतज़ार की कसक थी –

“बुझ करके कुछ चराग़ किसी शब न फिर जले,

वो लोग जो जुदा हुए अब तक नहीं मिले।”

वहीं धर्मेन्द्र त्रिपाठी ने ‘कुत्ता’ शीर्षक से तीखा व्यंग्य करते हुए सामाजिक बोध जगाया –

वह खुद मरेगा / अपने मालिक को बचाकर

आखिर वह कुत्ता है / आदमी नहीं।”

 विचार की परतें और हृदय का स्पर्श

श्रीधर मिश्र की “हस्ताक्षर” कविता में मनुष्य की कोमलता और सामाजिक परिपक्वता का संतुलन था –

“कुछ आदमियों में बचा रह जाता है

उनका बच्चापन ताउम्र…

और ये कच्चे आदमी ही

बचाते हैं पकी हुई दुनिया को।”

डा. कनकलता मिश्रा की संजीदगी भरी पंक्तियां दिल को छू गईं –

“ज़िन्दगी की दहलीज़ पर

एक रोज़ किसी की आहट हुई

किवाड़ खोलकर देखा

ज़िन्दगी की शाम थी।”

    Kavya Utsav 2025 मोहब्बत औरआत्माभिव्यक्ति की झलक

वसीम मज़हर की मोहब्बत में प्रतिरोध की खुशबू थी –

“ऐ ज़माने दरमियां से दूर हट

प्यार को ख़तरा है तेरे नाम से।”

सृजन गोरखपुरी ने ग़ज़ल में आत्मबल और जज़्बे को स्वर दिया –

“बहुत मज़बूत है दिल, काँच का प्याला नहीं है

तुम्हारे तोड़ने से टूटने वाला नहीं है।”

भोजपुरी गीत और जनवादी स्वर

चन्देश्वर परवाना ने भोजपुरी की मिठास में ममता की पीड़ा दर्शाई –

“राहि निहारत अँचरा भेंवत, माई रोवत होई।”

डा. जय प्रकाश नायक ने नवगीत के माध्यम से आर्थिक विषमता और वर्गसंघर्ष को स्वर दिया –

कोठी-बंगला नहीं, बस तेरी झोपड़ी

फिर भी लोगों की आँखों में कबसे गड़ी।”

वीरेन्द्र मिश्र दीपक ने खेतों से शहर तक पलायन की चिंता को दर्शाया –

“हम कितने मजबूर हो गए

खेतिहर से मजदूर हो गए।”

शब्दों के सहारे भविष्य की नींव

गोष्ठी में जिन रचनाकारों ने और उपस्थिति से वातावरण को समृद्ध किया, उनमें रवीन्द्र मोहन त्रिपाठी, कुमार अभिनीत, जगदीश खेतान, डा. अजय राय अनजान, अभिषेक मिश्र, दीक्षा मिश्र आदि उल्लेखनीय रहे।

आभार ज्ञापन संस्था के सचिव शशिविन्दु नारायण मिश्र द्वारा किया गया, जिन्होंने भावपूर्ण शब्दों में सभी उपस्थित रचनाकारों और श्रोताओं को धन्यवाद ज्ञापित किया।

 जब कविता बनती है संवाद

“अभिव्यक्ति” की यह गोष्ठी केवल एक आयोजन नहीं थी, बल्कि यह उस चेतना की पुष्टि थी कि कविता आज भी जीवित है, ज्वलंत है और परिवर्तनकारी है। जब कवि विचारों को शब्दों में ढालते हैं, तब केवल छंद नहीं जन्म लेते, बल्कि सामाजिक स्पंदन और सांस्कृतिक चेतना की लौ जलती है।

आज की कविता सिर्फ मनोरंजन नहीं है – यह प्रतिरोध है, प्रेम है, परिवर्तन है और संवाद है।

और इसी संवाद ने इस गोष्ठी को साहित्यिक इतिहास में एक मूल्यवान पंक्ति बना दिया।

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