Malegaon Blast Acquittal Big Twist: गवाह पलटे, साध्वी प्रज्ञा समेत सभी आरोपी बरी – 17 साल की लड़ाई का अंत!
Malegaon blast 2008 के हादसे ने पूरा देश हिलाया था: Malegaon blast acquittal की घोषणा के साथ वह दर्दनाक अध्याय लगभग 17 साल बाद समाप्त हुआ है। विशेष NIA कोर्ट ने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, पूर्व एमपी, लैफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित और पांच अन्य आरोपियों को बरी कर दिया है।
लंबी कानूनी लड़ाई — Malegaon blast acquittal की पृष्ठभूमि
29 सितंबर, 2008 को महाराष्ट्र के Malegaon में एक बम धमाका हुआ, जिसमें छह लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए ।
पहले मामले की जांच शुरू में महाराष्ट्र ATS ने की, फिर 2011 में NIA को सौंपी गई।
महाराष्ट्र ATS ने आरोप लगाया कि Pragya Ji की मोटो साइकिल इस धमाके में इस्तेमाल हुई थी, जबकि Lt Col Purohit पर भी Abhinav Bharat से जुड़े होने का सक और आरोप था ।
Investigative lapses — क्यों बरी किया गया?

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कोर्ट ने पाया कि UAPA की सैनक्शन ऑर्डर दोषपूर्ण थे, साथ ही फोरेंसिक रिपोर्ट्स अस्पष्ट और संदिग्ध थीं ।
लगभग 323 गवाहों में से 34–37 गवाहों कोर्ट में पलट गए या अपने बयान वापस ले लिए — इसका अधिक प्रभाव असर केस पर पड़ा ।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि mere suspicion cannot replace proof, इसलिए सभी को “insufficient evidence” के आधार पर बरी किया गया ।
क्यों यह फैसला कुछ लोगों को उम्मीद की किरण लग रहा है?
अदालत का यह निर्णय कानूनी प्रक्रिया में भरोसे की पुष्टि करता है: दोष सिद्ध न हो पाने पर बरी करना न्याय की निशानी है ।
Lt Col Purohit ने कहा, “My conviction never changed… thanks court for fair opportunity,” जिससे यह संदेश मिलता है कि अदालत निष्पक्ष रही ।
इस verdict से यह भी समझ आता है: legal accountability ज़रूरी है, आधारहीन आरोपों से बचाना न्याय का आधार है।
Malegaon blast acquittal किन सवालों ने हंगामा मचाया?
AIMIM चीफ Asaduddin Owaisi ने निर्णय पर गहरा निराशा जताई: उन्होंने पूछा, “Who killed those six लोग?” और कहा कि investigation पूरी तरह से भरोसेमंद नहीं थी ।
इस verdict ने एक गंभीर सवाल उठाया है कि वास्तविक जिम्मेदार कौन था, क्योंकि मृतकों के परिवारों को अब न्याय की उम्मीद कमजोर पड़ गई है।
मामले की प्रारंभिक जांच में ATS पर गवाहों को दबाव में बयान लेने और RDX साक्ष्य प्लांट करने का आरोप था — इससे एजेंसियों की विश्वसनीयता पर सवाल उठें हैं ।
गवाहों का पलटना और केस किस मोड़ पर सुपुर्द हुआ?
शुरुआती ATS चार्जशीट में गवाहों ने कथित रूप से धमाके में जुड़े लोगों के नाम लिए, लेकिन trial में 30+ गवाहों में से कई ने बयान वापस ले लिया ।
ATS पर आरोप है कि उसने सरकारी प्रक्रिया का दुरुपयोग करते हुए दबाव में बयान हासिल किए — वही बयान अदालत ने आधारहीन माना ।
Malegaon blast acquittal के दो पहलुओं का सारांश
Judicial Integrity दोष सिद्ध न होने पर बरी करना कानूनी सफाई दर्शाता है जांच की कमी और ATS की तरीकों पर सवाल उठते रहे
Public Perception बरी होने से कुछ लोग न्याय की जीत मानते हैं परिवार और पीड़ितों को न्याय नहीं मिला; आरोप कमज़ोर लगे
Accountability आरोपियों ने अदालत में अपने पक्ष को रख सकने का मौका पाया वास्तविक दोषियों की खोज अभी भी संदिग्ध बनी हुई है
Malegaon blast acquittal यह verdict एक strategic turning point है, जिसने यह दिखाया कि legal process must rest on solid proof, न कि सिर्फ संदेह। यह एक impact‑driven reaffirmation है कि न्याय तभी संभव है जब न्यायिक प्रणाली पूरी तरह निष्पक्ष हो।
Malegaon blast acquittalअब आगे क्या हो?
अदालत की राय स्पष्ट है: UAPA लागू नहीं हो सकता था क्योंकि संदेह पर्याप्त नहीं था। इससे संभवतः भविष्य में कमीशन या ATS की प्रक्रियाओं की जांच तेज होगी।
Sagarmala reforms की तरह कानूनी प्रणाली को और अधिक पारदर्शी व जवाबदेही बनाना अब प्राथमिकता हो सकता है।
इस verdict ने judicial scrutiny के रास्ते खोल दिए हैं जिससे future terror-investigations में सुधार संभव है।
Malegaon blast acquittal का फैसला एक लंबी कानूनी लड़ाई का परिणाम है जो “justice system” की मजबूती को दर्शाता है।
पुलिस या जांच एजेंसियों द्वारा आरोप लगाने से पहले proof beyond reasonable doubt का होना अनिवार्य है।
दोष साबित न हो पाने पर बरी करना न्याय की असल भावना है।
लेकिन उस दर्दनाक रात की यादें और छह जिंदगियाँ अब भी पीछे रह गई हैं— और सवाल है कि उनकी आवाज़ का न्यायिक जवाब कहाँ मिलेगा?
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